नागौर

मेडिकल कॉलेज खुला, पर हार्ट मरीज ‘रैफर टू हायर सेंटर’; गोल्डन ऑवर्स सडक़ पर हो रहे खत्म

हार्ट मरीजों को जांच से लेकर उपचार तक के लिए जाना पड़ता है जोधपुर-जयपुर, मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ नहीं लगा, गंभीर मरीजों का सही समय पर नहीं हो पाता इलाज, रैफर करने पर बढ़ जाता है खतरा, गोल्डन ऑवर्स रास्ते में की दूरी में हो जाते है खत्म

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Feb 25, 2026
JLN hospital nagaur

नागौर. नागौर में मेडिकल कॉलेज की शुरुआत को स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से बड़ी उपलब्धि बताया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिले के हार्ट (हृदय) मरीजों को आज भी जांच से लेकर उपचार तक के लिए जोधपुर, बीकानेर या जयपुर का रुख करना पड़ रहा है। गंभीर मरीजों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है, क्योंकि ‘गोल्डन ऑवर्स’— यानी हार्ट अटैक के बाद के शुरुआती महत्वपूर्ण घंटे अक्सर रास्ते की दूरी में ही खत्म हो जाते हैं।

जिला अस्पताल व मेडिकल कॉलेज परिसर में अब तक न तो नियमित हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) की नियुक्ति हो पाई है और न ही कैथ लैब (कार्डियक कैथेटराइजेशन प्रयोगशाला) जैसी अत्याधुनिक सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में सीने में दर्द, हार्ट अटैक या जटिल हृदय रोग से पीडि़त मरीजों को प्राथमिक उपचार देने के बाद रैफर करना मजबूरी बन जाता है।

विशेषज्ञों का अभाव, उपचार अधूरा

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार हार्ट मरीजों के लिए 24 गुणा 7 आपातकालीन सेवाएं, कार्डियक केयर यूनिट (सीसीयू), डिफिब्रिलेटर, प्रशिक्षित स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टर अनिवार्य होते हैं। इसके अलावा ईसीजी, इकोकार्डियोग्राम (इको), टीएमटी, सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी जैसी जांच सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन नागौर शहर में इन सुविधाओं का समुचित ढांचा विकसित नहीं हो पाया है। इसके साथ इन्वेसिव और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी— जैसे एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी, स्टेंटिंग के लिए कैथ लैब आवश्यक होती है। वहीं गंभीर मामलों में सीएबीजी (बायपास सर्जरी), वाल्व रिप्लेसमेंट, पेसमेकर प्रत्यारोपण जैसी सर्जिकल सुविधाएं जीवन रक्षक साबित होती हैं। इन सबके अभाव में मरीजों को दूसरे जिलों के बड़े अस्पतालों में भेजा जाता है, जहां पहुंचने के लिए तीन से चार घंटे का समय लग जाता है।

रेफर करने की मजबूरी

जेएलएन अस्पताल डॉक्टरों का कहना है कि कई बार मरीज को प्राथमिक उपचार देकर एम्बुलेंस से रैफर किया जाता है, लेकिन लंबी दूरी और यातायात के कारण देरी हो जाती है। हार्ट अटैक के मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। देरी से न केवल मरीज की हालत बिगड़ सकती है, बल्कि स्थायी हृदय क्षति या मृत्यु का जोखिम भी बढ़ जाता है। यही वजह है कि कोरोना के बाद बढ़े हार्ट मरीजों की उपचार के अभाव में मौत हो गई।

हर किसी के लिए बाहर जाना संभव नहीं

हार्ट मरीजों के परिजनों का दर्द भी कम नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए निजी एम्बुलेंस, बड़े शहरों में इलाज, रहने-खाने की व्यवस्था अतिरिक्त बोझ बन जाती है। कई बार समय पर इलाज न मिलने से परिणाम गंभीर हो जाते हैं।

पुनर्वास और परामर्श की भी कमी

हृदय रोगियों के लिए केवल सर्जरी या स्टेंटिंग ही पर्याप्त नहीं होती। हृदय पुनर्वास, नियमित जांच, दवाओं की उपलब्धता, योग व जीवनशैली में बदलाव का मार्गदर्शन, पोषण परामर्श और तनाव प्रबंधन भी जरूरी हैं। मेडिकल कॉलेज स्तर पर इन सेवाओं का समुचित संचालन अपेक्षित है, लेकिन फिलहाल यह व्यवस्था भी अधूरी है।

सवालों के घेरे में व्यवस्था

शहर के हृदय रोगी रामप्रताप ने बताया कि मेडिकल कॉलेज खुलने के दो साल बाद भी यदि गंभीर मरीजों को बाहर रैफर करना पड़े, तो यह स्वास्थ्य ढांचे पर सवाल खड़े करता है। वह भी खुद चिकित्सा मंत्री के गृह जिले में। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जिले में बढ़ते हृदय रोग मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों की नियुक्ति, कैथ लैब की स्थापना और 24 घंटे आपातकालीन कार्डियक सेवाएं शुरू करना समय की मांग है। जब तक यह सुविधाएं विकसित नहीं होतीं, तब तक नागौर के हार्ट मरीजों के लिए मेडिकल कॉलेज का उद्घाटन अधूरा ही माना जाएगा, क्योंकि इलाज अभी भी ‘हायर सेंटर’ पर ही निर्भर है।

Published on:
25 Feb 2026 12:27 pm
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