सरकार की नीतियों से हैण्ड टूल्स उद्योग पर मंडराया संकट, सितम्बर के बाद बिना आईएसआई मार्का के नहीं बिकेगी प्लायर, नागौर में सबसे ज्यादा इसी का काम, नागौर के हैण्ड टूल्स का देश के साथ विदेशों तक नाम, धीरे-धीरे खो रहा पहचान
नागौर. नागौर का हैण्डटूल्स (हस्त औजार) उद्योग देशभर में विशेष पहचान रखता है। हैण्डटूल्स उद्योग ने नागौर को खास पहचान दिलाई है। नागौर में तैयार होने वाले हैण्डटूल्स की भारत में अच्छी मांग है और अप्रत्यक्ष रूप से नागौर का माल विदेशों में भी निर्यात किया जाता है, लेकिन अब इस उद्योग पर संकट आने वाला है और इसकी वजह बनेगा भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से करीब एक साल पहले जारी किया गया आदेश, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि प्लायर सहित हैण्डटूल्स के 9 औजारों पर यदि आईएसआई मार्क नहीं होगा तो वे मार्केट में अपना माल नहीं बेच पाएंगे और उल्लंघन करने पर भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के तहत दंडित किया जाएगा।
नागौर के हैण्डटूल्स उद्यमियों का कहना है कि केन्द्र सरकार ने यह आदेश सबके लिए जारी किया है, बड़े उद्योगपतियों के लिए अपने औजारों पर आईएसआई मार्क लगवाना बड़ी बात नहीं है और वे पहले से लगवा भी रहे हैं, लेकिन नागौर शहर के लघु व कुटीर उद्योगों के लिए आईएसआई मार्क लगवाना संभव ही है, क्योंकि पहले तो उन्हें उच्च गुणवत्ता का लोहा मंगवाना पड़ेगा, जो सामान्य भट्टी में गर्म ही नहीं होगा। उच्च गुणवत्ता के लोहे को गर्म करके सांचे में ढालना इन उद्योगों की मशीनों से संभव नहीं है। ऐसे में सितम्बर 2025 के बाद प्लायर का काम बंद करना पड़ेगा, जबकि नागौर में सबसे ज्यादा प्लायर ही बनाए जाते हैं।
10 हजार से ज्यादा श्रमिक हो जाएंगे बेरोजगार
मोटे अनुमान के अनुसार नागौर हैण्डटूल्स का सालाना टर्न ओवर करीब 30 करोड़ रुपए का है। देश ही नहीं विश्वभर में नागौर को औजार नगरी के रूप में पहचान हैण्डटूल्स उद्योग के चलते ही मिली है। हैण्ड टूल्स उद्योग की खासियत यह है कि इसमें पुरुषों के साथ महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। मुल्तानी लौहार समाज की महिलाएं न केवल हैण्ड टूल्स बनाने में हाथ से काम कर रही हैं, बल्कि समय के साथ आए बदलाव के चलते मशीनें भी चला रही हैं। लौहारपुरा क्षेत्र में महिलाएं ग्राइण्डर, ड्रील, लेथ मशीन सहित अन्य मशीनें चलाकर हैण्ड टूल्स बना रही हैं। यहां की इकाइयों में हर महीने 500 टन माल का उत्पादन होता है। देश के विभिन्न शहरों के साथ साथ अरब, मध्य पूर्वी और यूरोपीय देशों में भेजा जा रहा है। नागौर सोने के औजार बनाने में नंबर वन है। प्लास बनाने का काम 1911 से चल रहा है। कहा जाता है कि रियासतों के समय में मुल्तान के लोहार तलवारें और औजार बनाने के लिए मारवाड़ आते थे। चीन के शीर्ष श्रेणी के उत्पाद भी नागौर के उत्पादों की तुलना में हल्के होते हैं।
फैक्ट फाइल
- हैण्डटूल्स उद्योग का सालाना टर्न ओवर - 30 करोड़ रुपए
- जिला मुख्यालय पर कुल इकाइयां - 100 लगभग
- हैण्ड टूल्स उद्योग में कार्यरत श्रमिक व कारीगर - 10-12 हजार लगभग
पहले बनाते थे तोपें, आज बना रहे हस्त औजार
आजादी से पूर्व रजवाड़ों के काल में मुल्तान से आए लौहारों ने यहां तोपें बनाने का काम शुरू किया। अंग्रेजों के शासन में तोपों का काम बंद हुआ तो ताले बनाने लगे, लेकिन समय के साथ ताले भी बंद होने लगे। इसके बाद इन कारीगरों ने सुनारी औजार बनाने शुरू किए। इसके बाद मुल्तानी कारीगरों ने बाजार की मांग के अनुसार हस्त औजार बनाने शुरू किए, जो आज भी बना रहे हैं और बहुत कम रेट में बाजार में उपलब्ध करवा रहे हैं।
ये बनते हैं हैण्ड टूल
नागौर शहर के लौहारपुरा सहित रीको क्षेत्र में संचालित फैक्ट्रियों में वर्तमान में मुख्य रूप से तैयार होने वाले हस्त औजारों में प्लायर (सरौता), टोंग्स (संडासी), कटर, नोज प्लायर, बालपेन, फ्रास पेन, स्ट्रेट पेन, हैमर, कतिया, पिनन्सर कटर, कुल्हाड़ी एवं ब्लैक स्मिथ टूल्स, मैसन तथा स्टोन कटिंग टूल्स आदि शामिल हैं।
जानिए, क्या है आईएसआई मार्क
आईएसआई (भारतीय मानक संस्थान) मार्क भारतीय मानक ब्यूरो की ओर से उत्पादों को दिया जाने वाला एक प्रमाणन चिह्न है, जो उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा और भारतीय मानकों के अनुरूपता की गारंटी देता है।
सरकार के आदेश में समस्या खड़ी कर दी
भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 17 सितम्बर 2024 को एक आदेश जारी कर हैण्ड टूल्स के 9 औजारों के लिए आईएसआई मार्क अनिवार्य किया गया है, जिसमें प्लायर भी है। नागौर में सब लघु व कुटीर उद्योग हैं, जिनके लिए आईएसआई मार्क लगवाना संभव नहीं है और इसके बिना वे अपने माल को मार्केट में बेच नहीं पाएंगे। ऐसे में नागौर के हैण्डटूल्स उद्योग पर संकट खड़ा हो जाएगा।
- सनत कानूगो, उपाध्यक्ष, नागौर हैण्डटूल्स एसोसिएशन, नागौर
सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत
नागौर के हैण्ड टूल्स उद्योग की चमक बरकरार रखने के लिए सरकारी प्रोत्साहन की आवश्यकता है। हैण्ड टूल्स के उद्यामियों को पहले गोगेलाव रीको में बिना लॉटरी प्राथमिकता से भूखंड देने की बात रीको ने की, लेकिन बाद में लॉटरी प्रक्रिया देने की बात करने लगे। यदि पहले ही बता देते तो हम कम दर पर ले लेते। अब रेट अधिक होने से छोटे उद्यमियों के लिए भूखंड लेना संभव नहीं है। इसी प्रकार विश्वकर्मा योजना में भी रजिस्ट्रेशन करवा दिया, लेकिन न तो प्रशिक्षण दिया गया और न ही सरकारी सहायता।
- खुदा बक्श, सचिव, नागौर हैण्डटूल्स एसोसिएशन, नागौर