पानी, समुद्री भोजन और पैकेज्ड फूड में मिल रहे माइक्रोप्लास्टिक कण, रिसर्च में सामने आए सूजन, सेल डैमेज और हार्मोनल असर के संकेत, अदृश्य प्रदूषण का असर: माइक्रोप्लास्टिक से स्वास्थ्य पर बढ़ती चिंताएं
नागौर. माइक्रोप्लास्टिक आज वैश्विक स्तर पर उभरती हुई एक गंभीर पर्यावरण और स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, अब हवा, पानी, मिट्टी और खाद्य पदार्थों तक में फैल चुके हैं। ये कण बड़े प्लास्टिक के टूटने से बनते हैं और इंसान इन्हें भोजन, पानी और सांस के जरिए अनजाने में शरीर के अंदर ले रहा है।
अध्ययनों में सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक कई सामान्य खाद्य पदार्थों में पाया जा रहा है। बोतलबंद पानी, नल का पानी, बीयर और दूध जैसे पेय पदार्थों में इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है, जिसमें बोतलबंद पानी में अधिक मात्रा पाई गई है। इसके अलावा समुद्री भोजन जैसे मछली, झींगा और शेलफिश भी इससे प्रभावित हैं, क्योंकि समुद्र में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के कारण ये कण सीधे खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाते हैं।
रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ जैसे नमक, चीनी, शहद और चाय भी इससे अछूते नहीं हैं। वहीं, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड जैसे चिप्स, बिस्किट और फास्ट फूड में भी माइक्रोप्लास्टिक मिलने की पुष्टि हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्लास्टिक पैकेजिंग, मशीनों और कंटेनरों के कारण यह संदूषण बढ़ता है। इसके अलावा प्लास्टिक कंटेनर में गरम खाना रखने, टी-बैग और प्लास्टिक कटिंग बोर्ड भी इसके स्रोत माने जा रहे हैं।
हाल के वर्षों में, मानव फेफड़ों के सभी भागों, मातृ एवं भ्रूण उपास्थि ऊतकों, मानव स्तन के दूध और मानव रक्त में सूक्ष्म प्लास्टिक पाए गए हैं। एम्स्टर्डम विश्वविद्यालय की पूर्व शोधकर्ता और सूक्ष्म प्लास्टिक वैज्ञानिक हीदर लेस्ली और उनके सहयोगियों ने नीदरलैंड्स के 22 स्वस्थ वयस्क स्वयंसेवकों में से 17 के रक्त नमूनों में सूक्ष्म प्लास्टिक पाए हैं। एनवायरनमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित इस शोध से वैज्ञानिकों के लंबे समय से चले आ रहे संदेह की पुष्टि होती है, ये छोटे कण मानव रक्तप्रवाह में अवशोषित हो रहे हैं। वैज्ञानिक लेस्ली कहती हैं, ‘पहले हमें लगता था कि प्लास्टिक के कण अवशोषित हो सकते हैं और मानव रक्तप्रवाह में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन अब हमें पता चल गया है कि वे वास्तव में मौजूद हैं।’
क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक शरीर पर कई संभावित प्रभाव डाल सकते हैं। शोध में पाया गया है कि ये शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) पैदा कर सकते हैं, जिससे लंबे समय में क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा ये कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और डीएनए डैमेज की संभावना रहती है। हार्मोनल असंतुलन और इम्यून सिस्टम पर भी इसका असर पड़ सकता है।
डीएनए को नुकसान
कुछ रिसर्च में यह भी संकेत मिले हैं कि माइक्रोप्लास्टिक डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे भविष्य में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
शोध अभी शुरुआती चरण में
कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक आंत, फेफड़ों और यहां तक कि मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं। इन कणों पर बैक्टीरिया और विषैले रसायन चिपककर शरीर में संक्रमण का खतरा बढ़ा सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि अभी तक यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि सामान्य मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक सीधे गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं, क्योंकि इस विषय पर शोध अभी शुरुआती चरण में है।
एक्सपर्ट व्यू.... कम उपयोग ही बचाव
माइक्रोप्लास्टिक का खतरा मानव शरीर के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है, इससे कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। बोतलबंद पानी, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड, चिप्स, बिस्किट, फास्ट फूड, प्लास्टिक कंटेनर में गरम खाना, चाय के प्लास्टिक कोटेड कप का उपयोग माइक्रोप्लास्टिक का खतरा बढ़ाते हैं। इससे बचाव के लिए प्लास्टिक का उपयोग कम करना होगा। स्टील या कांच के बर्तनों का इस्तेमाल, गरम भोजन को प्लास्टिक में न रखना, प्रोसेस्ड फूड से दूरी और ताजे खाद्य पदार्थों का सेवन माइक्रोप्लास्टिक के जोखिम को कम कर सकता है। कुल मिलाकर, माइक्रोप्लास्टिक एक छिपा हुआ खतरा बनकर उभर रहा है।
- डॉ अशोक झाड़वाल, एमडी (मेडिसिन) कन्सलटेंट फिजिशियन, जेएलएन अस्पताल, नागौर