देश की युवा महिलाओं के बारे में हाल ही में एक मेडिकल रिसर्च सामने आई है, जिसमें एक चिंताजनक खुलासा हुआ है। क्या कहती है यह रिसर्च? आइए जानते हैं।
भारत की प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं में पोषण संकट गहराता जा रहा है। 18 से 40 वर्ष की 44.07% स्वस्थ महिलाओं में असामान्य वजन के साथ एनीमिया पाया गया है। इसके अलावा 34.2% महिलाएं विटामिन बी12 की कमी से और 67% विटामिन-डी की कमी से जूझ रही हैं। ये कमियाँ गर्भकालीन डायबिटीज, प्री-एक्लेम्पसिया और कम वजन वाले शिशुओं के जन्म जैसे जोखिम बढ़ाती हैं। यह खुलासा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) की रिपोर्ट से हुआ है। इस रिपोर्ट में देश के 10 मेडिकल संस्थानों में 1,174 गैर-गर्भवती महिलाओं पर जांच के आंकड़े पेश किए गए हैं।
रिसर्च में यह भी सामने आया कि लगभग 50% महिलाओं में फेरिटिन का लेवल कम पाया जाता है, जो शरीर में आयरन भंडार के समाप्त होने का संकेत है। भले ही इन महिलाओं में अभी एनीमिया न हो, लेकिन यह ‘छिपी आयरन की कमी’ सामान्य जांच में पकड़ में नहीं आती और आगे चलकर गंभीर समस्या का रूप ले सकती है।
रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष यह है कि 42.9% महिलाओं में इंसुलिन प्रतिरोध पाया गया, जो टाइप-2 डायबिटीज की शुरुआती अवस्था माना जाता है। भारतीय महिलाओं में यह समस्या इसलिए ज़्यादा खतरनाक है क्योंकि सामान्य वजन के बावजूद उनके शरीर में आंतरिक वसा अपेक्षाकृत अधिक होती है। यह स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी असर डालती है। विटामिन बी12 और फोलेट की कमी भ्रूण के विकास को प्रभावित करती है, जिससे जन्म के समय कम वजन, स्टंटिंग और आगे चलकर बच्चों में मोटापा व डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
2018 में शुरू किए गए ‘एनीमिया मुक्त भारत’ अभियान का लक्ष्य हर साल 3% की दर से एनीमिया कम करना था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट रही है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-4 (2015-16) में महिलाओं में एनीमिया की दर 53% थी, जो एनएफएचएस-5 (2019-21) में बढ़कर 57% हो गई। ये आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा प्रयासों के बावजूद महिलाओं में पोषण और चयापचय से जुड़ा संकट गंभीर होता जा रहा है, जिस पर तत्काल और समग्र रणनीति की ज़रूरत है।