
Arbitration Council of India: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आर्बिट्रेशन काउंसिल ऑफ इंडिया को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि 2019 में कानून बनने के बाद भी छह साल में काउंसिल नहीं बन सकी। सीजेआई ने उम्मीद जताई कि अब इससे जुड़ा संशोधन विधेयक संसद में आएगा। उन्होंने कहा कि अगर भारत को आर्बिट्रेशन का बड़ा केंद्र बनना है तो सिर्फ घोषणा करना काफी नहीं है। फैसलों को समय पर लागू भी करना होगा। सीजेआई ने यह भी कहा कि देश में 5 करोड़ से ज्यादा लंबित मामलों का बोझ सिर्फ अदालतों के भरोसे कम नहीं किया जा सकता है।
नई दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्बिट्रेशन एंड मेडिएशन के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में CJI सूर्यकांत ने यह बात कही। उन्होंने बताया कि 2019 के संशोधन के जरिए आर्बिट्रेशन काउंसिल ऑफ इंडिया का प्रावधान किया गया था। इसका मकसद आर्बिट्रेशन संस्थानों की ग्रेडिंग करना और आर्बिट्रेटरों को मान्यता देना था।
उन्होंने कहा कि छह साल बीत जाने के बाद भी काउंसिल का गठन नहीं हो सका है। अक्टूबर 2024 में विश्वनाथन समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन (संशोधन) विधेयक का मसौदा सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया गया था। CJI ने उम्मीद जताई कि अब इसका नया मसौदा संसद में पेश किया जाएगा।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारत अगर आर्बिट्रेशन के लिए पसंदीदा स्थान बनना चाहता है तो घोषणा और उसके क्रियान्वयन के बीच का अंतर खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि यही वह भरोसे का संकट है, जिसे सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यवस्था की विश्वसनीयता सिर्फ फैसलों से नहीं बनती। जरूरी यह भी है कि जिन सुधारों की घोषणा की जाए, उन्हें समय पर लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत अब धीरे-धीरे वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) को न्याय का कमतर विकल्प नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के एक भरोसेमंद हिस्से के रूप में देख रहा है।
CJI ने कहा कि देश की अदालतों में इस समय 5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें से कम से कम आधे मामले वास्तविक लंबित मामलों की श्रेणी में आते हैं। इनमें ज्यादातर मामले जिला और निचली अदालतों में लंबित हैं। उन्होंने कहा कि सरकार और सरकारी संस्थाएं भी बड़ी संख्या में मामलों में पक्षकार हैं। वहीं, कुल लंबित मामलों में करीब पांचवां हिस्सा जमीन और संपत्ति विवादों का है। उन्होंने कहा कि इतने बड़े बैकलॉग को कोई भी न्यायिक व्यवस्था अकेले खत्म नहीं कर सकती। इसका समाधान अदालतों के बाहर भी तलाशना होगा।