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अरुणाचल में 11200 MW के सियांग डैम प्रोजेक्ट पर क्यों भड़क उठा आदि समुदाय? कहा- जमीन छोड़ने से बेहतर मरना पसंद करेंगे

Arunachal Pradesh dam protest: अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना के खिलाफ 27 गांवों के लोग विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों को डर है कि इस परियोजना से उनकी जमीन, खेती और सांस्कृतिक विरासत पर बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने जान देने की बात कहते हुए किसी भी प्रकार के सर्वे या ड्रिलिंग को रोकने का ऐलान कर दिया है।
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Updated: 28 Oct 2026, 9:12 AM IST
Siang Dam Project protest
अरुणाचल के सियांग में प्रस्तावित डैम का विरोध (फ़ोटो- ANI)

Siang Dam Project protest: अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित 11200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट (SUMP) को लेकर स्थानीय आदि आदिवासी समुदाय और सरकार के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। इस मेगा प्रोजेक्ट के विरोध का मुख्य केंद्र गेकू और उसके आस-पास के गांवों में तनाव तब और बढ़ गया, जब सुरक्षा बलों ने कई ग्रामीणों से दाओ (एक पारंपरिक औजार) जब्त करना शुरू कर दिया। आदि समुदाय के लिए दाओ का महत्व वैसा ही है, जैसा सिख समुदाय के लिए कृपाण का होता है, यह केवल खेती का एक औजार नहीं, बल्कि उनकी पहचान का एक अहम हिस्सा है।

दाओ जब्त किए जाने पर आक्रोश

TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, रीगा और पांगकांग गांवों में सुरक्षा कर्मियों पर दाओ से हमले के आरोपों के बाद प्रशासन और सुरक्षा बलों ने एहतियात के तौर पर दाओ जब्त करना शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय लोगों का असंतोष बढ़ गया। किसानों का कहना है कि जब भी वे घर से बाहर निकलते हैं, तो अपनी कमर पर दाओ बांधकर ही रखते हैं, जिससे वे बांस काटने, झाड़ियां साफ करने और खेतों की देखभाल का काम करते हैं। गेकू के एक किसान जॉन पान्यांग ने कहा कि दाओ उनकी पहचान और जरूरत दोनों है, इसलिए उन्हें अपने साथ इसे खेतों में ले जाने से नहीं रोका जा सकता।

बांध के विरोध में 27 गांवों ने मिलाया हाथ

अपर सियांग और सियांग जिलों के लगभग 27 गांवों ने इस विशाल बांध परियोजना के विरोध में हाथ मिला लिया है। प्रस्तावित बांध का मुख्य जलाशय गेकू के पास बनाया जाना है, जो जिला मुख्यालय यिंगकियोंग से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण क्षेत्र में खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। ढलानों और नदी किनारे पैदा होने वाली पारंपरिक चावल की किस्में जैसे गेगोंग, ईटानगर, नगोटसुम और ताकर की खेती करने वाले किसान समय पर खेतों में नहीं जा पा रहे हैं। इसके अलावा विरोध प्रदर्शनों के कारण आदि समुदाय ने अपने सबसे महत्वपूर्ण त्योहार सोलुंग को सीमित करके केवल झंडा फहराने तक ही सीमित कर दिया है।

ड्रिलिंग या फिजिबिलिटी रिपोर्ट नहीं बनने देंगे ग्रामीण

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीणों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की सख्ती का मुख्य उद्देश्य NHPC के लिए प्री-फिजिबिलिटी सर्वे और नदी तल में ड्रिलिंग का रास्ता साफ करना है। ग्रामीणों ने कहा है कि वे किसी भी तरह की ड्रिलिंग या फिजिबिलिटी रिपोर्ट नहीं बनने देंगे।

सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए ग्रामीण जॉन पन्यांग ने पूछा कि अगर मकसद सीमा के उस पार चीन द्वारा बनाए जा रहे बांधों का मुकाबला करना है, तो लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) से 300 किलोमीटर दूर सियांग क्षेत्र में इतना बड़ा बांध क्यों बनाया जा रहा है? उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को अपनी ही आबादी को विस्थापित करने के बजाय सीमा के करीब अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

1960 के दशक में बसे थे ग्रामीण

गेकू बस्ती में रहने वाले लगभग 1,000 परिवारों के लिए यह बांध उनकी सदियों पुरानी पैतृक जमीन, उनकी संस्कृति और उनके अस्तित्व के लिए सीधा खतरा है। अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर इन परिवारों का कहना कि वे 1960 के दशक में कुमकु पहाड़ियों से नीचे आकर नदी के किनारे बस गए थे। ग्रामीणों को डर है कि एक बार बांध बन जाने के बाद जलभराव या पानी छोड़े जाने की स्थिति पूरा इलाका पानी में डूब जाएगा।

स्थानीय निवासी ओकेन बोली पैंग्येंग ने कहा कि वे अपनी जमीन और अपने घर को खोने के बदले कोई मुआवजा नहीं चाहते। ग्रामीण इस आंदोलन को प्राथमिकता देने के लिए अपनी धान की फसल की कटाई को भी टालने को तैयार हैं।

Updated on:
28 Oct 2026, 9:12 AM IST
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