
Asiatic Lions in Gujarat: गुजरात के जंगलों में एशियाई शेरों की मौजूदगी अब गिर तक सीमित नहीं रह गई है। पोरबंदर और देवभूमि द्वारका के बीच फैला बरडा वन्यजीव अभयारण्य इन दुर्लभ वन्यजीवों के लिए एक नए आशियाने के रूप में उभर रहा है। करीब डेढ़ सदी बाद यहां शेरों की प्राकृतिक वापसी ने वन्यजीव संरक्षण की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। वैज्ञानिकों की निगरानी और आधुनिक तकनीक से मिले आंकड़े बता रहे हैं कि बरडा का जंगल शेरों के स्थायी ठिकाने में बदल सकता है।
गुजरात में गिर जंगलों के अलावा अब बरडा वन्यजीव अभयारण्य भी एशियाई शेरों का नया ठिकाना बन रहा है। पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों में करीब 192 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैले इस अभयारण्य में शेरों के लिए अनुकूल आवास, पर्याप्त शिकार और उपयुक्त पर्यावरणीय परिस्थितियां मौजूद हैं। हाल ही में गुजरात वन विभाग और बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के शोध के अनुसार 144 साल बाद शेर प्राकृतिक रूप से बरड़ा के जंगल में लौटे थे। शुरुआत में एक नर शेर आया, जिसके बाद वन विभाग ने पांच मादा शेरों को यहां पहुंचाया। वर्तमान में अभयारण्य में 17 शेर हैं।
शेरों की गतिविधियों और नए वातावरण में उनके व्यवहार को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने छह शेरों को रेडियो कॉलर लगाए। जनवरी 2023 से जुलाई 2025 तक दर्ज 1.69 लाख से अधिक जीपीएस लोकेशन का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि शेर बरडा के घास वाले इलाकों का नियमित इस्तेमाल कर रहे हैं। वे अपने विचरण क्षेत्र बना रहे हैं और आपसी सामाजिक संबंध भी विकसित कर रहे हैं।
ये संकेत बताते हैं कि शेर केवल इस इलाके से गुजर नहीं रहे, बल्कि यहां के पर्यावरण के साथ तालमेल बैठाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि, किसी क्षेत्र में उनकी दीर्घकालिक सफलता के लिए भोजन, पानी, सुरक्षित गलियारों और प्रजनन के अनुकूल परिस्थितियों का बने रहना जरूरी है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. जयपाल सिंह के अनुसार, बरडा में शेरों के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसी भी वन्यजीव अभयारण्य में बड़े शिकारी की मौजूदगी तभी टिकाऊ हो सकती है, जब उसे प्राकृतिक भोजन पर्याप्त मात्रा में मिले और उसके आवास पर दबाव सीमित रहे।
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने भी इस अध्ययन को एशियाई शेरों के संरक्षण के लिहाज से अहम बताया है। उनके मुताबिक, गिर से बाहर विचरण करने वाले शेरों के लिए बरडा दूसरा घर बनता जा रहा है।
शेरों की गतिविधियों और स्वास्थ्य पर रोजाना नजर रखने के लिए आठ पूर्णकालिक ट्रैकर तैनात किए गए हैं। इसके साथ ही, इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव की आशंका को देखते हुए त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था मजबूत की गई है। यह कदम आसपास के गांवों में सुरक्षा सुनिश्चित करने और शेरों की रक्षा करने, दोनों के लिए जरूरी है।
एशियाई शेरों का प्रमुख प्राकृतिक ठिकाना लंबे समय से गुजरात का गिर क्षेत्र रहा है। ऐसे में बरडा में उनकी सफल मौजूदगी किसी एक अभयारण्य की उपलब्धि भर नहीं, बल्कि पूरी प्रजाति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम है। अलग-अलग सुरक्षित आवास विकसित होने से किसी एक इलाके पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है। फिर भी, बरडा में शेरों की आबादी का भविष्य पर्याप्त शिकार, आवास की गुणवत्ता और मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व पर निर्भर करेगा।