राष्ट्रीय

Bankipur By Election: प्रशांत किशोर ने दांव पर लगा दी पूरी साख, बीजेपी ने बनाया ‘शर्मनाक हार’ देने का कड़ा प्लान

Bankipur Assembly Bypoll: जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भले ही खुद पहला चुनाव लड़ रहे हों, लेकिन यह उनकी तीसरी चुनावी परीक्षा होगी। इसमें फेल होने से उनकी पूरी मुहिम को झटका लग सकता है। ऐसा हो जाए, इसके लिए बीजेपी ने अपने नए उम्मीदवार अभिषेक कुमार को जिताने के लिए पूरी फौज उतार दी है।
3 min read
Jul 08, 2026
Prashant Kishore campaign in Bankipur by election Patna
Bankipur By Election: 8 जुलाई, 2026 को बांकीपुर में पदयात्रा के दौरान प्रशांत किशोर। (फोटो सोर्स: जन सुराज पार्टी)

बिहार विधान सभा की बांकीपुर सीट पर होने जा रहा उपचुनाव रोमांचक हो गया है। यह चुनाव दो बार फेल हो चुके प्रशांत किशोर की तीसरी राजनीतिक परीक्षा साबित होने जा रहा है। इस बार जन सुराज की ओर से वह खुद बतौर उम्मीदवार परीक्षा दे रहे हैं। भाजपा इस चुनाव को प्रशांत किशोर को 'अपमानजनक हार' दिलवाने के मौके के रूप में देख रही है। संभवतः इसी मंशा से भाजपा ने युवा नेता अभिषेक कुमार को उम्मीदवार बनाया है, जो इससे पहले कभी विधान सभा चुनाव नहीं लड़े हैं।

बांकीपुर उपचुनाव दोनों ही पार्टियों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। भाजपा के लिए भी और जन सुराज के लिए भी। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने विधान सभा चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारा था, लेकिन एक भी जीत नहीं सका। इससे पहले भी उन्होंने उपचुनावों में तीन उम्मीदवार उतार कर देखा था। तब भी उन्हें लोगों ने वोट नहीं दिया। लेकिन, वह राज्य भर में घूम कर विधान सभा चुनाव के मद्देनजर कोशिश करते रहे। इस कोशिश के नाकाम रहने के बाद कुछ दिन वह शांत रहे, लेकिन फिर नए सिरे से कोशिश जारी रखने की घोषणा की। अब इस चुनाव में खुद उतर कर उन्होंने बड़ा दांव खेला है। अगर वह जीत गए तो यह आगे की मुहिम के लिए संजीवनी का काम करेगी। अगर हार गए तो यह व्यक्तिगत के साथ-साथ 'बिहार में बदलाव' की उनकी मुहिम के लिए भी बड़ा झटका होगा।

भाजपा के लिए भी यह चुनाव जीतना राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल है। बांकीपुर भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा खाली की गई सीट है। साथ ही, इस पर 1995 से लगातार भाजपा का ही कब्जा रहा है। 1995 में नितिन नवीन के पिता यहां से विधायक बने थे। उनकी मृत्यु के बाद नितिन नवीन बने और लगातार बनते ही रहे। भाजपा ने जब उन्हें राज्य सभा भेजा तब उन्होंने यह सीट खाली की। इस तरह सीट बीजेपी का गढ़ है।

प्रशांत किशोर कहते हैं कि बांकीपुर की जनता को अब तक कोई अच्छा विकल्प नहीं मिला। पहली बार मिल रहा है। इसलिए उन्हें भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए। हालांकि, विधान सभा चुनाव में भी किशोर यही तर्क दे रहे थे, लेकिन जनता ने उनकी बात पर कान तक नहीं दिया। इस बार कितना सुनेगी, यह 3 अगस्त को पता चलेगा। प्रशांत किशोर की पूरी राजनीतिक साख दांव पर लगी है।

बांकीपुर भाजपा का गढ़ है, यह सोच कर वह निश्चिंत नहीं है। पूरे विधान सभा क्षेत्र को उसने 40 क्लस्टर में बांटा है। हर क्लस्टर में कार्यकर्ताओं व नेताओं की ड्यूटी लगाई गई है। हर घर में, हर मतदाता तक पहुंचने का टास्क दिया गया है। नितिन नवीन खुद चुनाव पर नजर रखे हुए हैं।

बीजेपी ने हर घर जाने का दिया टार्गेट

इतनी कवायद के बाद भी भाजपा संदेश यह देना चाह रही है कि वह चुनाव को हल्के में ले रही है। एकदम नया उम्मीदवार उतारना इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसके पीछे एक और मकसद हो सकता है प्रशांत किशोर को 'शर्मनाक हार' का संदेश देना। जैसे भवानीपुर में ममता बनर्जी को शुभेन्दु अधिकारी से हरवा कर दिया।

भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के प्रदेश उपाध्यक्ष अभिषेक राष्ट्रीय अध्यक्ष के काफी करीबी माने जाते हैं। वह 15 साल से नितिन नवीन के साथ काम कर रहे हैं। भाजपा से उनका जुड़ाव करीब 27 साल पुराना है। वह बूथ स्तर से ही पार्टी में सक्रिय रहे हैं। वह पटना महानगर भाजयुमो अध्यक्ष, दो बार मण्डल अध्यक्ष, मण्डल मंत्री और महामंत्री भी रह चुके हैं। नितिन नवीन को जैसे पिता की विरासत के रूप में बांकीपुर सीट मिली, वैसे ही उन्हें विश्वास है कि वह अभिषेक को जितवा देंगे। मूल चुनाव में नवीन ने राजद की रेखा गुप्ता को करीब 52000 वोटों से हराया था। ऐसे में वह इस बार भी बीजेपी की जीत को लेकर आश्वस्त हैं। राजद ने इस बार भी रेखा गुप्ता को ही उतारा है।

बांकीपुर में कायस्थ का बोलबाला रहा है। 1957 से हुए 18 चुनावों में 12 बार कायस्थ नेता ही यहां से विधायक बने। नौ बार तो नितिन नवीन और उनके पिता ही जीते हैं। भाजपा ने अभिषेक को चुनते हुए इस बार भी कायस्थ कार्ड को नहीं छोड़ा है। प्रशांत किशोर भले ही जाति के आधार पर वोट नहीं देने की अपील करते रहे हैं, लेकिन चुनाव में जाति कार्ड का महत्व उन्हें भी पता है। शायद तभी वह भरत तिवारी के एनकाउंटर को मुद्दा बनाते हुए उसके अगड़ी जाति के होने का जिक्र करना भी नहीं भूलते हैं।

ये तो बात हुई प्रशांत किशोर और अभिषेक कुमार के पहले विधान सभा चुनाव लड़ने की। अब अगर आप जानना चाहते हैं कि राम विलास पासवान को पहली बार विधान सभा जाने और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने का मौका कैसे मिला था तो यहां क्लिक करें

वर्ष 2000 में राम विलास पासवान ने सीएम बनने का बीजेपी का जो ऑफर ठुकराया, नीतीश कुमार ने उसे मान लिया था।
Updated on:
08 Jul 2026 03:11 pm
Published on:
08 Jul 2026 02:59 pm