10 अप्रैल 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जब राम विलास पासवान ने ठुकराया था बीजेपी का ऑफर तब पहली बार सीएम बने थे नीतीश कुमार

राम विलास पासवान के पास दो बार बिहार का सीएम बनने का मौका आया था, लेकिन वह चूक गए।

4 min read
Google source verification

पटना

image

Vijay Kumar Jha

Apr 10, 2026

Nitish Kumar Rajya Sabha MP

वर्ष 2000 में राम विलास पासवान ने सीएम बनने का बीजेपी का जो ऑफर ठुकराया, नीतीश कुमार ने उसे मान लिया था।

करीब 20 साल सीएम रहने के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर दिल्ली की राजनीति में लौट गए हैं। नीतीश के जाने के साथ ही बिहार में जेपी आंदोलन से जुड़े तीन बड़े नेताओं (लालू, नीतीश, पासवान) का दौर खत्म हो गया है।

नीतीश और लालू के दोबारा सीएम बनने की कोई उम्मीद नहीं है। राम विलास पासवान अब इस दुनिया में नहीं हैं। वह कभी सीएम नहीं बने, लेकिन केंद्र में अक्सर मंत्री रहे। वैसे एक मौका ऐसा आया था जब पासवान सीएम बनने का दांव खेल सकते थे। लेकिन, तब उन्होंने अलग ही दांव चल दिया था। यह मौका फरवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में मिला था।

सीएम बन सकते थे पासवान

फरवरी 2005 के चुनाव में पासवान की पांच साल पुरानी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को 29 सीटें मिली थीं। वह जिसे समर्थन देते उसकी सरकार बन जाती और इसके बदले वह सीएम पद की शर्त भी रख सकते थे। लेकिन, उन्होंने एक अलग ही शर्त रख दी थी। उन्होंने कहा जो मुस्लिम सीएम बनाएगा, वह उसी को समर्थन देंगे। इस तरह राज्य में किसी की सरकार नहीं बनी और राष्ट्रपति शासन लग गया था।

इससे पहले 2000 के चुनाव में पासवान को बीजेपी की ओर से सीएम पद की पेशकश हुई थी, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने का सच समझते हुए उन्होंने मना कर दिया था। तब नीतीश सीएम बने थे और कुछ ही दिन में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

पासवान की राजनीति अलग ही तरह की थी। वह जहां अपने लिए अवसर देखते, उधर के हो जाते थे। इसीलिए विरोधी उन्हें ‘राजनीति का मौसम विज्ञानी’ भी कहा करते थे। करीब 51 साल के राजनीतिक जीवन में वह छह प्रधानमंत्रियों (वीपी सिंह से मोदी तक) के मंत्रिमंडल में रहे। वैसे पिछले कुछ सालों में नीतीश की भी वही छवि बन गई थी और उन्हें ‘सुशासन बाबू’ से ज्यादा ‘पल्टू चाचा’ कहा जाने लगा।

लालू-नीतीश से अलग अंदाज में शुरू हुई थी राम विलास की राजनीति

लालू-नीतीश छात्र राजनीति और जेपी आंदोलन से निकले नेता थे, लेकिन राम विलास की राजनीति कुछ अलग ही अंदाज में शुरू हुई थी। संतोष सिंह ने अपनी किताब ‘जेपी टु बीजेपी’ में इसका किस्सा बयान किया है।

राम विलास पासवान पढ़-लिख कर अफसर बनने वाले थे। उन्होंने डीएसपी की परीक्षा भी पास कर ली थी। लेकिन, एक स्थानीय नेता ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उस नेता का नाम था लक्ष्मी आर्या। उन्होंने राम विलास से कहा कि सरकार बनोगे या नौकर, चुन लो। मतलब मंत्री बनना है या अफसर?

राम विलास ने चुन लिया और पिता से कहा- मुझे एमएलए बनना है। हाथ में आई डीएसपी की नौकरी छोड़ने की बात सुन कर पिता जामुन दास बड़े खीझे, लेकिन बेटे ने तय कर लिया था तो कुछ कर नहीं सके।

पहले ही चुनाव में दिग्गज ने कहा लौंडा, उसे ही दे दी मात

1969 का चुनाव सिर पर था। आर्या ने पटना में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के नेताओं से राम विलास को टिकट देने के लिए बात की। यहीं से उनकी राजनीति शुरू हो गई।

खगड़िया के अलौली विधानसभा क्षेत्र में 1952 से ही मिस्री सदा का सिक्का चलता आ रहा था। वामपंथी पार्टियां उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारती तो थीं, लेकिन वे उन्हें टक्कर नहीं दे पा रहे थे। 1969 में एसएसपी ने राम विलास पासवान को उम्मीदवार बनाया।

250 रुपये की साइकल और दोस्त जगदीश मोची
पासवान ने 250 रुपये में एक साइकल खरीदी। यह पैसा उन्हें पिता ने टॉनिक खरीदने के लिए दिया था। लेकिन, पैसे से साइकल खरीदी गई और दोस्त जगदीश मोची के साथ सवारी शुरू हो गई। एक साइकल चलाता तो दूसरा आगे के डंडे पर बैठता। इस तरह राम विलास का चुनाव प्रचार शुरू हो गया।

दिग्गज विधायक ने पासवान को मुंह पर कहा था ‘लौंडा’

एसएसपी ने पहली बार अलौली से उम्मीदवार उतारा था। वह भी कांग्रेस के मिस्री सदा के खिलाफ, जिन्हें कोई टक्कर नहीं दे पा रहा था। पासवान को कोई जानने वाला तक नहीं था। मिस्री सदा तो क्या ही जानते! एक बार ट्रेन में उन्हें पासवान मिल गए। बातचीत होने लगी। वह काफी अकड़ में थे। उन्होंने पासवान से कहा- इस बार हमारे गढ़ में कोई नया 'लौंडा' हमें चुनौती देने उतरा है। 'लौंडा' शब्द सुन कर पासवान बड़े आहत हुए थे।

पासवान को अपनी पार्टी में भी नेता नहीं पहचानते थे। उस समय कर्पूरी ठाकुर एसएसपी के सबसे बड़े नेता थे। उन्हें भी नहीं पता था कि अलौली का उनका उम्मीदवार कौन है। लेकिन, मधु लिमये (मुंगेर के सांसद) और रामजीवन सिंह जैसे बड़े नेता पासवान के के लिए सभा कर चुके थे। वे साइकल से उनका प्रचार देख कर बड़े प्रभावित हुए थे। लेकिन, मतगणना शुरू होने तक किसी को उनकी सफलता की उम्मीद नहीं थी। लेकिन वोटों की गिनती जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, सब हैरान होते चले गए। अंत में पासवान ने सदा का किला फतह कर लिया और उन्हें 700 वोट से हरा दिया था।

विधायक राम विलास ने कर्पूरी ठाकुर को नहीं पहचाना

विधायक बन कर राम विलास पटना पहुंचे। वह एमएलए फ्लैट में रहते थे। एक दिन कर्पूरी ठाकुर अलौली के अपने नए विधायक से मिलने पहुंच गए। दोनों एक-दूसरे को नहीं पहचानते थे। राम विलास ने उनसे कह दिया कि विधायक जी घर पर नहीं हैं। कर्पूरी ठाकुर ने कहा, 'आएं तो कहिएगा कर्पूरी ठाकुर आए थे।' यह सुनते ही पासवान बड़े शर्मिंदा हुए और माफी मांगते हुए अपने नेता के पैर छू लिए।

स्कूल के दिनों में ट्रेन पर चढ़ने की ख़्वाहिश ऐसे की थी पूरी

पासवान के बारे में उनके इलाके में एक किस्सा चर्चित है कि जब वह हाई स्कूल में पढ़ते थे तब उन्हें रेलगाड़ी में चढ़ने का मन किया। यह इच्छा पूरी करने के लिए वह मूंगफली बेचने वाला बन गए थे। एक दिन वही पासवान रेल मंत्री बने।

पासवान रहन-सहन में लोहिया के समाजवाद पर पूरा अमल करते थे, जिसके मुताबिक समाजवाद का मतलब यह नहीं है कि गरीबों में समानता हो, बल्कि समृद्धि की समानता है। सर्दियों में प्रिंस सूट और गर्मियों में झक सफेद, कड़क कुर्ता पहनना, बढ़िया खाना और शानदार जीवन जीना…पासवान के जीवन का फलसफा था।