
कभी नीतीश कुमार नहीं चाहते थे कि बिहार में चुनाव प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी आएं। (फ़ाइल फोटो)
2005 का साल बिहार में नीतीश युग की शुरुआत के लिए याद रखा जाएगा। यह शुरुआत उन्होंने भाजपा के साथ मिल कर की थी। उसी भाजपा ने करीब 20 साल बाद नीतीश युग का अंत भी कराया। विधान परिषद से इस्तीफा देने के बाद नीतीश कुमार ने अब पहली बार राज्य सभा सांसद की शपथ ली है (10 अप्रैल को)।
2005 में बिहार में दो बार विधानसभा चुनाव हुए थे। एक बार फरवरी में और फिर नवंबर में। फरवरी में किसी को बहुमत नहीं मिला। राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को 29 सीटें मिल गईं। पासवान ने खुद को 'किगमेकर' घोषित कर दिया और किसी को भी समर्थन देने के लिए मुस्लिम सीएम बनाने की शर्त रख दी। लिहाजा किसी सूरत में सरकार नहीं बन पाई और राष्ट्रपति शासन लग गया।
नवंबर में हुए चुनाव में नीतीश भाजपा के साथ लड़े। सीएम का कोई चेहरा घोषित नहीं हुआ था। पहले चरण का मतदान हो चुका था। संतोष सिंह अपनी किताब 'जेपी टु बीजेपी' में लिखते हैं कि भाजपा को ग्राउंड से उत्साहजनक रिपोर्ट मिल रही थी। तब बीजेपी के केन्द्रीय नेताओं ने अटल बिहारी वाजपेयी और एलके आडवाणी को इस बात के लिए राजी किया कि नीतीश को एनडीए का सीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए। इसमें अरुण जेटली की अहम भूमिका थी।
किताब में सुशील कुमार मोदी के हवाले से लिखा है, 'मैंने केन्द्रीय नेतृत्व का मूड भांप लिया था और पटना में नीतीश कुमार की सीएम पद पर उम्मीदवारी घोषित कर दी। जाहिर है, नीतीश इससे काफी उत्साहित थे और मुझसे कहा था कि एक दिन मैं यह कर्ज चुकाऊंगा।'
इसी जगह नीतीश के हवाले से लिखा है, 'भागलपुर की सभा में वाजपेयी जी को सीएम के रूप में मेरी उम्मीदवारी का ऐलान करना था। उन्होंने किसलय अपहरण कांड के बारे में विस्तार से बात की, मेरी खूब तारीफ भी की, लेकिन उन्हें जो कहना था (सीएम पद के बारे में) वह नहीं कहा। हो सकता है उनके दिमाग से उतर गया हो।'
जो भी हो, लेकिन मतदान के दूसरे चरण से ही एनडीए खेमे में यह साफ हो गया था कि सीएम नीतीश बनेंगे। और, हुआ भी ऐसा ही।
2009 लोकसभा और 2010 बिहार विधानसभा चुनाव आते-आते नीतीश का कद काफी बढ़ गया था। 2009 के लोकसभा चुनाव में वह एनडीए के पीएम उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मंच साझा करने लगे थे। उन्होंने नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार नहीं करने दिया था। हालांकि, 2015 में जब नीतीश लालू के साथ चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने मीडिया इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने कभी नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार करने से नहीं रोका है। यह बीजेपी का फैसला था। यह पूरी तरह उनका फैसला था।' वैसे, नीतीश यहां तक बोल गए थे, 'बिहार में एक मोदी (सुशील) है ही, दूसरे की जरूरत नहीं है।'
2010 में सुशील मोदी एनडीए नेताओं को खाने पर बुलाना चाहते थे। कहा जाता है कि नीतीश ने शर्त रख दी कि नरेंद्र मोदी नहीं आएंगे। बीजेपी नेता बड़े असमंजस में पड़ गए। अंत में लाल कृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज ने तय किया कि जाएंगे तो सभी, नहीं तो कोई नहीं। नरेंद्र मोदी ने अक्सर नीतीश पर हमला बोलने के लिए इस प्रकरण का जिक्र किया, लेकिन नीतीश कहते रहे कि डिनर रद्द करने का फैसला उनका था, मुझे केवल सूचित किया गया था।
नीतीश के इस तेवर की झलक चुनावी नतीजों में भी देखने को मिली। 2010 के चुनाव में जेडीयू को 115 (बहुमत से मात्र 7 कम) और बीजेपी को 91 सीटें मिलीं।
नीतीश पहली बार सीएम बने तो उन्हें कुछ ही दिन बाद इस्तीफा देना पड़ा था, लेकिन 2005 में सीएम बने तो फिर बनते ही चले गए। चाहे चुनावी नतीजा जो भी हो। जेडीयू की सीटें घटे या बढ़े। सीएम नीतीश ही रहे। जब नहीं रहे तो अपने मन से जीतन राम मांझी को बनाया। फिर मन किया तो उनसे कुर्सी वापस भी ले ली। सीएम बने रहने के लिए उन्होंने कई बार पाला भी बदला और खुद पर ‘पल्टू राम’ का ठप्पा भी लगवाया। इससे ‘सुशासन बाबू’ की जो छवि उन्होंने बनाई थी, वह काफी कमजोर हुई।
बिहार से दिल्ली की राजनीति में लौटते हुई नीतीश ने अपने ऊपर ‘परिवारवाद’ का भी ठप्पा लगवा लिया, क्योंकि उनकी अध्यक्षता में उनके बेटे निशांत ने जेडीयू की सदयस्ता ले ली है। नीतीश अब तक परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोपों से बचे थे। उनके करीबी बताते हैं कि उनका साफ कहना था कि उनके रहते उनका बेटा निशांत राजनीति में नहीं आएगा। लेकिन, उनका यह विचार अब बदल गया है। अब देखना सिर्फ यह है कि निशांत को पार्टी या सरकार में क्या ज़िम्मेदारी मिलती है और नीतीश के बाद बिहार का सीएम कौन होगा?
Updated on:
10 Apr 2026 12:39 pm
Published on:
16 Mar 2026 05:15 pm
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