
1994 की इस रैली के बाद बदल गई थी नीतीश की राजनीतिक दिशा। (फोटो एआई से)
नीतीश कुमार बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना कर 1, अणे मार्ग (सीएम हाउस) से निकल रहे हैं। जो नेता शुरुआत में चुनावी राजनीति से दूर रहने का मन बना चुका हो, शुरू के दो चुनाव हार गया हो वह सीएम की कुर्सी तक पहुंच गया और कुर्सी पर रहने का रिकॉर्ड तक बना गया। नीतीश की इस कामयाबी की जमीन एक रैली से तैयार हुई। रैली भी वह जिससे उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। लिहाजा इसके लिए उन्होंने न कोई उत्साह दिखाया और न ही सक्रियता दिखाई थी। पर, इस रैली का नाम तय करने में उनकी भूमिका जरूर थी।
नीतीश पहली बार 1977 में विधानसभा का चुनाव लड़े थे। दो बार हार गए, 1985 में पहली बार विधायक बने। फिर अगली बार हार गए। उनकी राजनीतिक जीवन का नया अध्याय 1990 के दशक में शुरू हुआ, जब उन्होंने अपनी अलग समता पार्टी बनाई।
नीतीश को लालू से अलग होकर, अपने दम पर राजनीति करने का विश्वास 1994 की कुर्मी चेतना रैली के बाद हुआ था। इस रैली के बाद ही समता पार्टी बनी थी।
बात 1994 की है। कुछ लोग, जो सीधे तौर पर राजनीति में सक्रिय नहीं थे, एक रैली करने का विचार लेकर आए। इसका मकसद कुर्मियों को जागरूक करना था। नीतीश कुमार उस समय सबसे बड़े कुर्मी नेता थे। लालू प्रसाद के बाद राज्य में दूसरे सबसे कद्दावर नेता वही माने जाते थे। लेकिन, नीतीश को कुर्मी रैली का आइडिया दमदार नहीं लग रहा था।
कुर्मी समाज के कई लोग और नेता नीतीश के पास कुर्मी रैली का आइडिया लेकर पहुंचे। इनमें नीतीश के ग्रामीण बिरेश सिन्हा भी शामिल थे। उनके हवाले से संतोष सिंह ने अपनी किताब ‘जेपी टु बीजेपी’ में लिखा है कि रैली के बारे में सुन कर नीतीश ने कहा था- आप लोग दिन में तारे देख रहे हैं। लोग कहां से आएंगे? नीतीश ने रैली में सक्रिय हिस्सेदारी से तो इंकार कर दिया, लेकिन उसके नाम को लेकर एक सुझाव जरूर दिया। उन्होंने कहा कि इसमें 'चेतना' जोड़ दीजिये। इस तरह रैली का नाम 'कुर्मी चेतना रैली' पड़ा।
वामपंथी विचारों वाले विधायक सतीश कुमार को छोड़ कर इस कुर्मी चेतना रैली से बिहार का कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं जुड़ा। इसके लिए बैनर ऑल इंडिया कुर्मी महासभा ने दिया। बैनरों पर शरद पवार और उमा भारती की तस्वीरें लगाई गईं। विनय सिंह जैसे कई कारोबारियों ने आर्थिक मदद दी। अजय सिंह रॉकेट जैसे 15 कुर्मी युवाओं का दल कुर्मी चेतना रथ लेकर चला करता था। अनिल कुमार, बिरेश सिन्हा और सतीश कुमार पटना मुख्यालय से इनके साथ तालमेल बिठाए रखते थे।
बिरेश सिन्हा ने इस रैली की कहानी बयान करते हुए बताया है कि जिस रूट से हमें जाना होता था वहां पहले हम एक पायलट गाड़ी लेकर निकलते थे। लोग अपने आप हमारी मीटिंग्स में आने लगे, जबकि हमारे पास भाषण देने वाला कोई बड़ा नेता तक नहीं था। लालू से नाराज भूमिहार लोग भी हमें पीछे से मदद देने लगे। वे हमें रैलियों के लिए बसें तक देते थे।
रैली के लिए लोगों को जुटाने निकली गाड़ियां और जागरूकता रथ जगह-जगह से गुजरने लगे तो खुफिया विभाग की रिपोर्ट्स में कहा जाने लगा कि रैली में अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटने की संभावना है। लेकिन, नीतीश कुमार अभी भी इसे कोई महत्व नहीं दे रहे थे। रैली से तीन दिन पहले उन्होंने बयान जारी कर कहा कि वह इसमें भाग नहीं लेंगे, लेकिन एक दिन पहले (11 फरवरी, 1994) उनका मन बदल गया।
बिरेश सिन्हा के हवाले से संतोष सिंह लिखते हैं, 'रैली से एक दिन पहले हमें उनका (नीतीश) फोन आया। उन्होंने रैली के बैनर पर बाहरी नेताओं (शरद पवार, उमा भारती) की तस्वीरों पर आपत्ति जताई। हमने कहा कि अब तो इसे बदल नहीं सकते। शायद नीतीश कुमार को भीड़ का अंदाज हो गया था। फिर वह लालू के साथ भी थे, जो नहीं चाहते थे कि रैली का श्रेय कोई दूसरा लूट ले जाए और कुर्मियों का नेता बन कर उभर जाए। नीतीश रैली में आने के लिए राजी हो गए।'
रैली में जब भोला प्रसाद सिंह बोलने आए तो उन्होंने कहा कि लालू का नाम लेना पाप है। बिरेश बताते हैं, 'उनकी इस बात पर जबर्दस्त ताली बजी। उसी क्षण नीतीश को राजनीति में अपना अलग मुकाम बनाने का भरोसा हो गया। नीतीश ने रैली के लिए कुछ किया नहीं, पर उन्होंने रैली को हाइजैक कर लिया।'
इस रैली के पहले से ही नीतीश और लालू में खटास शुरू हो गई थी। नीतीश अलग भी होना चाहते थे, लेकिन जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में लिखा है कि रैली से पहले ही लालू ने नीतीश को एक संदेश भिजवाया था कि यदि वह रैली में गए तो इसे विद्रोह समझा जाएगा। हालांकि, रैली के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सतीश कुमार बता चुके हैं कि अंततः नीतीश को रैली में जाने के लिए लालू यादव ने ही कहा था। उन्हें लगा था कि नीतीश नहीं गए तो सतीश कुमार बिहार में कुर्मियों के नेता बन जाएंगे।
रैली में भारी भीड़ थी। नीतीश मंच पर चढ़े तो भीड़ ने जिंदाबाद के नारे लगाए। लेकिन, उनकी गोलमोल बात सुन कर लोगों ने चप्पल फेंकनी शुरू कर दी। तब सतीश कुमार ने नीतीश को समझाया कि लोग सीधे शब्दों में अपनी बात सुनना चाहेंगे।
फिर नीतीश ने कहा- भीख नहीं, हिस्सेदारी चाहिए। जो सरकार हमारे हितों को नजरअंदाज करती है, वो सत्ता में नहीं रह सकती है।
बिरेश कहते हैं कि लालू की परछाई से निकल कर नीतीश के नेतृत्व में समता पार्टी का बनना इस रैली का ही नतीजा रहा। 1994 के विधानसभा चुनाव में समता पार्टी को सात ही सीटें मिलीं, लेकिन यहीं से नीतीश की राजनीति की दिशा बदल गई।
Updated on:
10 Mar 2026 09:43 am
Published on:
10 Mar 2026 09:37 am
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