
नीतीश कुमार और उनके बेटे निशांत कुमार
नीतीश कुमार के पैतृक गांव कल्याण बिगहा से पटना के मुख्यमंत्री निवास 1, अणे मार्ग की दूरी महज 70 किलोमीटर है, लेकिन कुमार को यह दूरी तय करने में 25 साल से भी ज्यादा लग गए थे। एक बार जब वह वहां पहुंच गए तो फिर हिले नहीं। करीब 20 साल जमे रहे। अब वह एक बार फिर दिल्ली का रुख कर चुके हैं।
नीतीश ने 30 मार्च को बिहार विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसी के साथ वह अपने नए राजनीतिक पड़ाव (राज्य सभा) के और करीब पहुंच गए।
नीतीश कुमार की यह यात्रा संभवतः उनके सियासी सफर के 'सम्मानजनक' अंत की शुरुआत है। इसके साथ ही उनके बेटे निशांत की राजनीतिक यात्रा शुरू हो चुकी है। माना जा रहा है कि विधान परिषद में खाली हुई नीतीश की सीट निशांत कुमार भरेंगे। पिता से अलग, निशांत बिना किसी सियासी अनुभव के इस सफर पर निकले हैं। उनका अब तक का जैसा जीवन दुनिया के सामने आया है, उससे यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि वह अपने बूते कितनी लंबी और कैसी राजनीतिक यात्रा कर पाएंगे। उन्हें इसके लिए तैयार करने की कोशिश हर स्तर पर शुरू हो गई है। कई नेता आजकल निशांत को ‘कोचिंग’ दे रहे हैं, ताकि वह जनता को पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने और बढ़ाने का भरोसा दिला सकें।
निशांत की जो छवि मीडिया के जरिए अब तक सामने आई है, उसे देखते हुए कई लोग उन्हें राजनीति के लिए 'मिसफिट' मानते हैं। वैसे तो नीतीश भी खुद को राजनीति के लिए मिसफिट मानते थे। शुरुआत में उनके मन में चुनावी राजनीति नहीं करने तक का ख्याल आ गया था। लेकिन, पत्नी मंजू सिन्हा ने समझाया कि चुनाव नहीं लड़ना तो फिर राजनीति करने का मतलब ही क्या?
शुरू में नीतीश विधानसभा चुनाव लड़े तो लगातार दो बार हार गए।
1980 में दूसरी हार के बाद तो नीतीश कुमार कोई छोटा-मोटा बिजनेस करने तक की सोच चुके थे। उनके साथी मुन्ना सरकार ने बताया है कि कुछ समय के लिए उन्होंने गुमनाम तरीके से पीयरलेस इंश्योरेंस में पैसा लगाना भी शुरू कर दिया था। लेकिन, पत्नी और मां परमेश्वरी देवी को उन पर भरोसा था। तभी तो मां उन्हें अपने पेंशन से पैसे बचा कर बेटे को चुनाव लड़ने के लिए देती रहीं। अंततः कामयाबी मिली।
तो, निशांत के बारे में भी अभी कोई नतीजा नहीं निकाला जा सकता। हां, यह जरूर है कि वह अभी तक लाइम लाइट में आए बिना अपने हिसाब से ज़िंदगी जीते आ रहे हैं। कार्यक्रमों में पहुंच कर भी मीडिया से बच कर ही रहा करते हैं। एक बार मां की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने कल्याण बिगहा गए। 20 मिनट रहे। गांव वालों से हाथ मिलाया, थोड़ी बातचीत की, लेकिन मीडियावालों से बात किए बिना लौट गए।
नीतीश की शुरू से राजनीति में दिलचस्पी थी। वह कॉलेज के जमाने से ही राजनीति में आ गए थे और छात्र आंदोलन से निकले नेता थे। उनके मामले में यह भी था कि कई दोस्त और करीबी राजनीति में सक्रिय थे। बख्तियारपुर का उनका एक पड़ोसी मुन्ना सरकार उन्हें स्कूटर पर पीछे बिठा कर घुमाया करते थे। दोनों साथ-साथ राजनीतिक कार्यक्रमों और अभियानों में जाया करते थे। 1980 के दशक में एक बार दोनों ऐसे ही एक कार्यक्रम में रहुई (हरनौत) गए थे। शाम हो गई तो अंधेरे के चलते स्कूटर को गांव में ही छोड़ना पड़ा। तब दोनों एक जीप में पीछे लटक कर खड़े-खड़े घर गए थे।
नीतीश के उभार में 1994 में हुई 'कुर्मी चेतना रैली' का बड़ा रोल रहा। वैसे इस रैली के पीछे उनकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी, न ही यह उनका आइडिया था। इसके पीछे जिस कुर्मी नेता सतीश कुमार की भूमिका थी, वह इसका फायदा नहीं उठा सके। लेकिन, रैली से नीतीश कुमार को एक अलग पहचान मिल गई।
निशांत बिना कोई ठोस होम वर्क किए मैदान में उतरे हैं या उतारे गए हैं। उन्हें जदयू और बिहार सरकार में आगे क्या भूमिका दी जाती है, इस बारे में अभी कुछ सार्वजनिक नहीं है। चर्चा है, उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। उनके कुछ शुभचिंतक इसे सही संकेत नहीं मानते हैं। उन्हें डर है कि जिस तरह हाल के कुछ महीनों में नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर उनकी नकारात्मक छवि गढ़ी गई, उसी तरह निशांत की अनुभवहीनता को लेकर उनकी नकारात्मक छवि न बना दी जाए। ऐसा हुआ तो निशांत ‘लॉंच’ होने से पहले ही ‘फेल’ हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में जदयू भी कमजोर हुए बिना नहीं रह पाएगी।
Updated on:
30 Mar 2026 01:52 pm
Published on:
30 Mar 2026 12:39 pm
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