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Bengal Election: दार्जिलिंग की धुंध में उलझा है पहचान और पट्टे का सियासी गणित

Bengal Election: दार्जिलिंग चुनाव 2026 में गोरखालैंड का मुद्दा कमजोर पड़ता दिख रहा है, जबकि चाय बागान मजदूरों की मजदूरी और जमीन अधिकार जैसे मुद्दे चुनावी केंद्र बन गए हैं। पंचकोणीय मुकाबले में श्रमिक वर्ग निर्णायक भूमिका में है।

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Apr 19, 2026
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 (Patrika Graphic)

Bengal Election: दार्जिलिंग की पहाड़ियों में हमेशा से पहचान की राजनीति हावी रही है। गोरखालैंड के नारे दशकों तक यहां की सियासत का केंद्र रहे हैं। लेकिन 2026 के चुनाव में तस्वीर बदलती नजर आ रही है, जहां मुख्य मुद्दा अब प्रशासन, अधिकार और न्यूनतम मजदूरी बन गया है। टॉय ट्रेन की आवाज और माल रोड की चहल-पहल के बीच इस बार सियासी चर्चा जमीन के पट्टे और चाय बागान मजदूरों के अधिकारों पर केंद्रित है। पहाड़ी क्षेत्रों की सीटों पर इस बार सीधा और बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।

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गोरखालैंड बनाम विकास का बदलता मुद्दा

दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में गोरखालैंड आंदोलन लंबे समय तक राजनीतिक पहचान का आधार रहा है। लेकिन अब दीवारों पर लिखे नारे धुंधले पड़ चुके हैं और उनकी जगह पर्चा-पट्टा और न्यूनतम मजदूरी जैसे ठोस मुद्दों ने ले ली है। चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं और श्रमिकों की मांग स्पष्ट है कि उन्हें केवल वादे नहीं, बल्कि अधिकार चाहिए। यह बदलाव संकेत देता है कि मतदाता अब भावनात्मक मुद्दों के बजाय व्यावहारिक जरूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

पंचकोणीय मुकाबले से बदला समीकरण

इस बार चुनावी मुकाबला पारंपरिक दो दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पांच प्रमुख ताकतें मैदान में हैं। भाजपा गठबंधन, जो पिछले चुनावों में मजबूत स्थिति में रहा है, अब भी अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस समर्थित अनित थापा विकास और प्रशासनिक सुधार के एजेंडे के साथ उभरे हैं। अजय एडवर्ड्स ने एक अलग मोर्चा बनाकर मुकाबले को और जटिल बना दिया है। इसके अलावा वाम दल, आइएसएफ और कांग्रेस भी अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं, जिससे चुनावी गणित और पेचीदा हो गया है।

चाय बागान श्रमिक बने किंगमेकर

सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार के चाय बागानों में रहने वाले लाखों श्रमिक इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम मजदूरी और जमीन का मालिकाना हक है। एक महिला श्रमिक का कहना है कि चुनाव आते जाते रहते हैं, लेकिन उनकी समस्याएं अब भी हल नहीं हुई हैं। यही वर्ग इस बार सत्ता का रुख तय कर सकता है। 23 अप्रेल को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि पहाड़ की जनता भावनात्मक मुद्दों को चुनती है या अपने हक और विकास को प्राथमिकता देती है।

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