बेंच ने कहा कि नामांकन के समय विधि स्नातक से एकत्र किए गए सभी विविध शुल्क अनिवार्य रूप से नामांकन की प्रक्रिया के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में काम करते हैं।
कानूनी पेशा अपनाने जा रहे युवा वकीलों को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम निर्णय में कहा कि बार काउंसिल नए वकीलों का नामांकन करते समय अधिवक्ता अधिनियम में निर्धारित फीस से अधिक राशि नहीं वसूल सकती। कोर्ट ने कहा कि नामांकन शुल्क पर स्पष्ट सीमा निर्धारित करते हुए स्पष्ट किया कि वकीलों से नामांकन के लिए पूर्व शर्त के रूप में ली गई कोई भी राशि 'नामांकन शुल्क' के बराबर ही होगी।
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने बार काउंसिल के नियमों से संबंधित विभिन्न याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कहा की बार काउंसिल की ओर से सत्यापन शुल्क, भवन निधि, परोपकारी निधि, आवेदन पत्र, डाक, पुलिस सत्यापन, आईडी, प्रशासनिक व फोटोग्राफ जैसे शुल्क आदि के नाम पर वसूली जाने वाली फीस एकमुश्त नामांकन शुल्क का ही हिस्सा होगा। बेंच ने कहा कि नामांकन के समय विधि स्नातक से एकत्र किए गए सभी विविध शुल्क अनिवार्य रूप से नामांकन की प्रक्रिया के लिए एक पूर्व शर्त के रूप में काम करते हैं।
अधिवक्ता अधिनियम की धारा 24 (1) विशेष रूप से उन पूर्व शर्तों को निर्धारित करती है जिनके अधीन एक वकील को नामांकित किया जा सकता है। चूंकि धारा 24 (1) (एफ) राज्य बार काउंसिल (एसबीसी) की ओर से नामांकन शुल्क बताती है, ऐसे में एसबीसी और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआइ)निर्धारित नामांकन शुल्क के अलावा अन्य शुल्क के भुगतान की मांग नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय आगे के लिए लागू होगा। एससीबी तथा बीसीआइ को वसूला जा चुका शुल्क वापस नहीं करना होगा।
कोर्ट ने कहा कि राज्य बार काउंसिलें अतिरिक्त नामांकन शुल्क की आड़ में धन एकत्र नहीं कर सकतीं। जिन युवा विधि स्नातकों ने अब तक कॅरियर भी शुरू नहीं किया है, उनसे धन एकत्र करने के बजाय बार काउंसिलों को प्रेक्टिस कर रहे वकीलों से धन एकत्र करने के लिए उचित तरीके अपनाने चाहिए। नामांकन से पहले अतिरिक्त शुल्क वसूलना युवा विधि स्नातकों के साथ अन्याय है। एसबीसी और बीसीआइ युवा विधि स्नातकों को नामांकन के लिए पूर्व शर्त के रूप में अत्यधिक धनराशि देने के लिए मजबूर कर रहे हैं।