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Cauvery Issue: कावेरी विवाद पर सी. जोसफ विजय का बड़ा दांव: बोले- ‘तमिलनाडु के हक के लिए अपमान भी मंजूर’, जानिए क्या है पूरा विवाद

Karnataka Cauvery Dispute : कावेरी जल विवाद पर राजनीति गर्माने के बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने चुप्पी तोड़ते हुए सीधे संवाद का बड़ा दांव खेला है। कर्नाटक के साथ बैठक रद्द होने और विपक्ष के तीखे हमलों के बावजूद सीएम विजय ने विधानसभा में स्पष्ट कर दिया कि राज्य के अधिकारों और किसानों के हक के लिए वे किसी भी राजनीतिक जोखिम या अपमान को सहने के लिए सहर्ष तैयार हैं।
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Aug 07, 2026
Cauvery Water Dispute
Cauvery Water Dispute : कावेरी मुद्दे पर राजनीति नहीं, समाधान चाहिए: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय (फोटो सोर्स: ANI)

Cauvery Water Dispute: दक्षिण भारत की सबसे संवेदनशील जल-राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। तमिलनाडु विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उदयनिधि स्टालिन द्वारा कावेरी का मुद्दा उठाए जाने के बाद मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा कि वे कावेरी जैसे जीवन-मरण के मुद्दे पर सस्ती राजनीति नहीं करना चाहते। सीएम विजय ने खुलासा किया कि कर्नाटक के साथ सीधे संवाद की पहल खुद उन्होंने ही की थी, ताकि बेंगलुरु जाकर दशकों पुराने इस अंतर-राज्यीय जल संकट का कोई सकारात्मक हल निकाला जा सके।

'जनता के लिए हर अपमान सहने को तैयार'

3 अगस्त को कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ होने वाली बहुप्रतीक्षित बैठक के रद्द होने के बाद कयासबाज़ी शुरू हो गई थी। सत्ता के गलियारों में चर्चा थी कि यदि वार्ता विफल होती है तो मुख्यमंत्री को राजनीतिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ सकती है।

इस पर सीएम विजय ने विधानसभा में भावुक लेकिन दृढ़ रुख अपनाते हुए कहा:

"अगर तमिलनाडु की जनता और हमारे किसानों के भले के लिए मुझे किसी शर्मिंदगी या अपमान का सामना भी करना पड़े, तो मैं अपने लोगों की खातिर उसे सहने के लिए तैयार हूं।"

उन्होंने सदन को भरोसा दिलाया कि मेकेदाटू (Mekedatu) परियोजना को रोकने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा गया है और राज्य के संवैधानिक अधिकारों की हर कीमत पर रक्षा की जाएगी।

1969 से अब तक: कानूनी और राजनीतिक संघर्ष

कावेरी नदी को तमिलनाडु की जीवनरेखा बताते हुए मुख्यमंत्री ने 1969 से लेकर अब तक के ऐतिहासिक घटनाक्रम का ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि राज्य ने बातचीत के मेज से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपने पानी के हक के लिए लगातार संघर्ष किया है।

क्यों इतना जटिल और पुराना है कावेरी जल विवाद?

कावेरी नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि दोनों पड़ोसी राज्यों की जीवन रेखा और राजनीति का मुख्य केंद्र है:

औपनिवेशिक काल से विवाद: इस विवाद की शुरुआत ब्रिटिश काल में 1892 और 1924 के समझौतों से हुई थी, जो तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर रियासत के बीच हुए थे। 1974 में 50 साल पुराना समझौता खत्म होने के बाद कर्नाटक ने पानी के नए बंटवारे की मांग की।

न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट का आदेश: लंबी खींचतान के बाद 1990 में 'कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण' (CWDT) का गठन हुआ। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए अंतर-राज्यीय नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया और पानी का कोटा पुनर्गठित किया, जिसके क्रियान्वयन के लिए 'कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण' (CWMA) काम कर रहा है।

मेकेदाटू परियोजना बनी नई चिंगारी: कर्नाटक सरकार रामनगर जिले में कावेरी नदी पर करीब 9,000 करोड़ रुपये की लागत से 'मेकेदाटू बैलेंसिंग रिजर्वायर' बनाना चाहती है, ताकि बेंगलुरु को पीने का पानी दिया जा सके। वहीं, तमिलनाडु का तर्क है कि इससे कावेरी डेल्टा के निचले क्षेत्रों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह रुकेगा, जिससे तमिलनाडु के लाखों किसानों की 'कुरुवई' फसलों और आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा।

कानूनी दांव-पेच, कम बारिश के संकट और क्षेत्रीय राजनीति के बीच सीएम विजय का यह बयान तमिलनाडु की राजनीति में एक नया और निर्णायक मोड़ ले आया है।

Updated on:
07 Aug 2026 11:59 am
Published on:
07 Aug 2026 11:40 am