
China's Northern Sea Route Arctic: अमेरिका ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज जलडमरुमध्य में नेवल ब्लॉकेड की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस वजह से तेल व गैस आपूर्ति की सप्लाई लाइन पर व्यापक रूप से असर पड़ा है। इस युद्ध की वजह से अब दुनिया के देश नए व्यापारिक मार्ग तलाशने में जुट गए हैं। दुनिया में जारी उथल-पुथल के बीच चीन ने एक नया और चौंकाने वाला कदम उठाया है।
बीजिंग ने रूस के उत्तरी तट से गुजरने वाले नॉर्दर्न सी रूट यानी एनएसआर पर नियमित कंटेनर सेवा शुरू कर दी है। यह सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले सालों में समुद्री ताकत के बदलते संतुलन का संकेत भी है। जिसका सीधा असर भारत की रणनीति पर भी पड़ने वाला है।
कई मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो चीन की शिपिंग कंपनी सी लिजेंड ने निंगबो-झोउशान बंदरगाह से ब्रिटेन के फेलिक्स्टोवे तक इस रास्ते से करीब 18 दिन की यात्रा सेवा शुरू कर दी है, जबकि स्वेज नहर से यही सफर तय करने में 40 दिन से ज्यादा लग सकते हैं। करीब 5,500 किलोमीटर लंबा यह मार्ग गर्मियों में बर्फ पिघलने की वजह से पहले के मुकाबले ज्यादा समय तक जहाजों के लिए खुला रहने लगा है।
दरअसल चीन बरसों से आर्कटिक को अपनी 'पोलर सिल्क रोड' परियोजना का हिस्सा बनाने में जुटा है। 2017 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के साथ मिलकर आर्कटिक शिपिंग मार्ग विकसित करने की बात कही थी। अब पहली नियमित व्यावसायिक सेवा शुरू कर बीजिंग उसी रणनीति को धरातल पर उतार रहा है।
भारत भी इस बदलाव से अनजान नहीं है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मार्च 2022 में जो आर्कटिक नीति लॉन्च की थी, वह अब सिर्फ जलवायु और वैज्ञानिक शोध तक सीमित नहीं रही। अब इसमें ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग, खनिज संसाधन और रूस से बेहतर कनेक्टिविटी जैसे पहलू भी जुड़ गए हैं। भारत 2008 से आर्कटिक में वैज्ञानिक तौर पर मौजूद है, और अब नॉर्दर्न सी रूट को आर्थिक व रणनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।
खास बात यह है कि भारत के पास आर्कटिक तक पहुंचने का अपना रास्ता भी मौजूद है। चेन्नई से व्लादिवोस्तोक तक बन रहे ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर को भविष्य में नॉर्दर्न सी रूट से जोड़ने पर काम चल रहा है। 2025 में नई दिल्ली में हुए भारत-रूस व्यापार मंच के दौरान राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच इस मार्ग पर सहयोग बढ़ाने को लेकर सहमति भी बनी थी। दोनों देशों ने इसके लिए एक साझा कार्यसमूह भी बनाया है, जो आइसब्रेकर निर्माण और ध्रुवीय जल में जहाज चलाने के प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करेगा।
हालांकि भारत के लिए यह रास्ता चीन जितना फायदेमंद नहीं है, क्योंकि भौगोलिक स्थिति की वजह से चीन इस मार्ग का ज्यादा स्वाभाविक इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा ऊंची परिचालन लागत, बर्फ में चलने वाले खास जहाजों की कमी और सीमित नौवहन मौसम जैसी दिक्कतें भी सामने हैं। पर्यावरण को लेकर भी खतरा कम नहीं, क्योंकि तेल रिसाव जैसी किसी दुर्घटना की सूरत में वहां राहत कार्य बेहद मुश्किल हो सकता है। साथ ही इस मार्ग का बड़ा हिस्सा रूस के नियंत्रण में है, जिससे यूक्रेन युद्ध के बाद लगे प्रतिबंधों के चलते यह रास्ता और भी राजनीतिक बन गया है।