कर्नल कौशल मिश्र की कविता- हम कर्म करें सदा ही भरपूर, हम भाग्य के भरोसे रहे नहीं। परिणाम मिले उसका जो भी, हम क्यों न उसे स्वीकार करें नाकाम होने पे कभी डरे नही, उठ कर के फिर से यत्न करें। पढ़ें पूरी कविता विस्तार से....
हम कर्म करें सदा ही भरपूर,
हम भाग्य के भरोसे रहे नहीं।
परिणाम मिले उसका जो भी,
हम क्यों न उसे स्वीकार करें
नाकाम होने पे कभी डरे नही,
उठ कर के फिर से यत्न करें।
असम्भव से सम्भव करने का,
बार-बार क्यों न प्रयास करें।
निराशा हमको कभी घेरे नहीं,
अपने परिश्रम का ध्यान करें।
हम कर्म करें सदा ही भरपूर,
हम भाग्य के भरोसे रहें नहीं।
सुखमय जीवन जीने के लिए,
जैसा मिले उसे स्वीकार करें।
अगर इच्छा होती है पूर्ण नहीं,
समझाएँ मन को सन्तोष करें।
उतार चढ़ाव जीवन में होते हैं,
यह सत्य भी तो स्वीकार करें।
इच्छाएँ सब पूरी होती हैं नहीं,
इस तथ्य को हम समझा करें
हम कर्म करें सदा ही भरपूर,
हम भाग्य के भरोसे रहें नहीं।
जो भाग्य भरोसे बैठे रहते हैं,
उन्हें कुछ हासिल होता नहीं।
जो कर्म करता है भरपूर सदा,
वह इच्छा पूर्ति से वंचित नहीं।
सफलता उनको ही मिलती है,
जो भाग्य भरोसे रहता है नहीं।
सफलता का सिद्धांत है यह,
जो परिश्रम बिन संभव है नहीं।
हम कर्म करें सदा ही भरपूर,
हम भाग्य के भरोसे रहें नहीं।
भाग्य भी साथ देता है उनका,
श्रम से होते जो विमुख नहीं।
असफल होने पर जिन्हें कोई,
श्रम से जुदा कर सकता नहीं।
भूल चूक हो गई कहाँ हम से,
पता करने से कभी हटते नहीं।
भाग्य का साथ मिलेगा उसको,
जो केवल भाग्य भरोसे है नहीं।
हम कर्म करें सदा ही भरपूर,
हम भाग्य के भरोसे रहें नहीं।
कर्मवीर उनको कहा जाता है,
जो कर्मों से कभी भी हटे नहीं।
जितनी भी बाधाएँ आती गईं,
वे उनसे कभी भी डरे ही नहीं।
हथियार जिसने भी डाल दिये,
वह युद्ध में विजयी हुआ नहीं।
उठो अपने उपर भरोसा करो,
डर कर जीवन जीना है नहीं।
हम कर्म करें सदा ही भरपूर.
हम भाग्य के भरोसे रहें नहीं।