मुंबई में रईसों का इलाका बांद्रा वेस्ट। जगह पेरी क्रॉस रोड और दोपहर का वक्त। रोड पर सन्नाटा था। उस सन्नाटे में ही पांच किलो का एक हथौड़ा हवा में घूमा और एक चमचमाती सफेद कंटेसा की विंडशील्ड पर पड़ा।
Crime Files: यह वह दौर था जब मुंबई में अंडरवर्ल्ड बेकाबू था। जो भी हफ्ता देने में आनाकानी करता, उसे बेरहमी से मार दिया जाता था। इसी कड़ी में गुलशन कुमार की भी हत्या हुई। अबु सलेम ने उन्हें मंदिर के सामने ही मारने की कसम ली थी। कसम पूरी करने के बाद उसने एक पत्रकार से फोन पर जो कहा था, वह तो और भी सन्न कर देने वाली बात थी। पढिए एस हुसैन जैदी कीकिताब ‘डोंगरी टु दुबई: सिक्स डिकेड्स ऑफ द मर्डर माफिया’ में दर्ज दास्तान।
मुंबई में रईसों का इलाका बांद्रा वेस्ट। जगह पेरी क्रॉस रोड और दोपहर का वक्त। रोड पर सन्नाटा था। उस सन्नाटे में ही पांच किलो का एक हथौड़ा हवा में घूमा और एक चमचमाती सफेद कंटेसा की विंडशील्ड पर पड़ा। कांच के टुकड़े बिखर गए, धमाके की आवाज से गली गूंज उठी और गाड़ी वहीं रुक गई। अचानक चार लोग आए। वे काले कपड़े पहने थे। उनके हाथों में हथियार था। उन्होंने गाड़ी को घेर लिया। एक ने टूटी हुई विंडशील्ड पर हाथ मारा, शीशे की परत हट गई और अंदर बैठे लोग साफ दिखने लगे।
पीछे की सीट पर काले सूट में एक आदमी बैठा था। पलक झपकते ही उसे गोलियों से छलनी कर दिया गया। इसके बाद हमलावर उतनी ही तेज़ी से गायब हो गए जितनी तेज़ी से आए थे। लोगों को कुछ समझ नहीं आया। वे अपनी-अपनी बालकनी से झांक रहे थे। सामने एक लाश पड़ी थी। लाश में छेद ही छेद थे।
मरने वाले के शरीर में तीस गोलियां धंसी थीं। मरने वाला था थकियुद्दीन अब्दुल वाहिद, ईस्ट वेस्ट एयरलाइन्स का मालिक।
वाहिद ने कामयाबी की नई इबारत लिखी थी। वह जब कोच्चि (केरल) से मुंबई आए तो कुछ नहीं था। दादर में ट्रेवल एजेंसी से शुरुआत की थी। फिर इतनी तरक्की की कि कुछ ही साल बाद पहली निजी एयरलाइन शुरू कर सरकारी इंडियन एयरलाइन्स को टक्कर देने लगे। लेकिन, गोलियों की गूंज में सब खत्म हो गया था।
हत्या में हथौड़े का इस्तेमाल संकेत कर रहा था कि यह काम छोटा राजन के सबसे भरोसेमंद शार्प शूटर रोहित वर्मा ने किया है। वर्मा के कत्ल करने का तरीका यही था। लेकिन, राजन ने वाहिद को क्यों मरवाया? उसने बिल्डर ओम प्रकाश कुकरेजा के कत्ल का बदला लेने की ठान ली थी और दो महीने के भीतर काम को अंजाम भी दिला दिया। कुकरेजा राजन का मददगार था। दाऊद गिरोह ने उसकी हत्या करा दी थी। राजन चाहता था कि दुश्मन समझे कि वह हर वार का जवाब देगा। इसलिए उनसे वहीद को निशाने पर लिया। उसे पता था कि हर बड़े कत्ल के बाद पुलिस छापे मारती है, लोगों को उठाती है और शहर में सख्ती बढ़ जाती है। इसलिए उसने मामला ठंडा होने के लिए दो महीने इंतजार किया।
कुकरेजा और वाहिद के कत्ल ने मुंबई के अमीर तबके को हिला दिया था और पुलिस के अफसर भी घबराए हुए थे। जब माफिया सड़कों पर आता है तो मुंबई पुलिस को जनता और नेताओं दोनों तरफ से गालियाँ पड़ती हैं। पुलिस यही कहती रही कि मरने वाले खुद माफिया से जुड़े थे, आम आदमी को खतरा नहीं है। लेकिन सरकार और नेता यह साबित करने में लगे थे कि पुलिस फेल हो गई है।
मगर किसी को नहीं पता था कि जो हुआ है वह तो बस शुरुआत है। कुकरेजा और वाहिद के कत्ल के बाद जैसे सिलसिला चल पड़ा। राजन, शकील, गवली और नए खिलाड़ी सलेम तक ने अपने विरोधियों और उन्हें पैसे देने वालों को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। जो हफ्ता वसूली नहीं देता था उसे गोली मिलती थी। मनीष शाह, दिलीप वालेचा, नटवरलाल देसाई, करीम मारेडिया, वल्लभ ठक्कर, सुनीत खातू, सब दिन-दहाड़े मारे गए।
ये कत्ल इन डॉन्स के लिए जहाँ एक तरफ शान की बात थे, वहीं उन लोगों के लिए चेतावनी थी जो पैसे देने में आनाकानी कर रहे थे। सालों बीत गए, लाशें बढ़ती रहीं। चार साल में गैंगवार पहले से कहीं ज़्यादा खूनी हो गई। डॉन सुरक्षित बैठे थे और उनके चेले मरते रहे।
सलेम की नजर फिल्म इंडस्ट्री पर थी। सुभाष घई और राजीव राय पर हमले नाकाम रहे, शूटर पकड़े गए। फिर उसने रियाज़ सिद्दीकी को मरवाया। शकील ने फिल्ममेकर मुकेश दुग्गल को निशाना बनाया। और सलेम ने अपनी नज़रें एक बड़े शिकार पर टिका दीं। वह शिकार था गुलशन कुमार।
गुलशन कुमार, दिल्ली के दरियागंज में जूस बेचने वाले का बेटा। बड़े सपने लेकर पला। तेईस साल की उम्र में नोएडा में सुपर कैसेट्स शुरू की, सस्ती ऑडियो कैसेट बेचीं और देखते ही देखते कारोबार चल निकला। फिर भजनों की कैसेट, धर्म पर वीडियो और फिर मुंबई में टी-सीरीज़ का जन्म हुआ।
उस ज़माने में फिल्म इंडस्ट्री में कुछ खास लोगों का ही सिक्का चलता था। गुलशन ने यह दबदबा तोड़ा। सोनू निगम, अनुराधा पौडवाल, कुमार सानू जैसे नए चेहरों को मौका दिया। नए एक्टर और डायरेक्टर लाए। टी-सीरीज़ सिर्फ भारत में नहीं, दुनिया भर में मशहूर हो गई और गुलशन कुमार म्यूज़िक इंडस्ट्री के बेताज बादशाह बन गए।
वैष्णो देवी की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए हर साल वो देवी का भंडारा कराते थे। 1992-93 में वह देश के सबसे ज़्यादा टैक्स देने वालों में गिने जाते थे।
सलेम काफी समय से उन पर दबाव बना रहा था, हर महीने पांछ लाख रुपये मांगता था। गुलशन ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा था कि यह पैसा वो माता वैष्णो देवी के भंडारे में देंगे, किसी गुंडे को नहीं। सलेम को यह बात नागवार गुज़री और उसने उन्हें मंदिर के सामने मारने की ठान ली।
5 अगस्त, 1997 को इंडियन एक्सप्रेस के एक पत्रकार ने सलेम को उसके दुबई के नंबर पर फोन किया। फिल्मी हस्तियों पर हमलों के बारे में पूछा। सलेम ने बेफिक्री से कहा, "मैं घई या राजीव राय को मारना नहीं चाहता था, बस डराना था। लेकिन अगले हफ्ते देखना, मेरे लोग एक फिल्मी शख्सियत को खत्म करेंगे। इस बार डराना नहीं, पूरी इंडस्ट्री को सबक सिखाना है।"
पत्रकार सीधे क्राइम ब्रांच चला गया और क्राइम ब्रांच चीफ रणजीत सिंह शर्मा को पूरी बात बताई। शर्मा ने तुरंत हरकत में आकर बॉलीवुड के कई बड़े नामों को सुरक्षा दिलाई, लेकिन गुलशन कुमार का नाम उनके दिमाग में आया ही नहीं।
पता चला कि हर सुबह गुलशन कुमार काम पर निकलने से पहले अंधेरी के जीतेश्वर महादेव मंदिर जाते थे। उनके पास एक निजी सुरक्षाकर्मी था, जो उन दिनों बीमार था। 12 अगस्त 1997 को सलेम के गुर्गों ने खबर दी कि वो अकेले हैं। सलेम ने हुक्म दिया कि मंदिर से निकलते वक्त मारो और मारते वक्त फोन पर लाइव सुनाओ।
राजा नाम के शूटर ने गुलशन पर गोलियां दागीं। गोलियां उनकी बांह और कमर में लगीं। दर्द से बिलबिलाते हुए उन्होंने पास के सार्वजनिक शौचालय में छुपने की कोशिश की। लेकिन, शूटर ने उनका पीछा किया और फिर से गोलियां दागीं।
जान बचाने की आखिरी कोशिश में गुलशन रेंगते हुए पास की एक झोंपड़ी में घुसे। खून बह रहा था, सांसें उखड़ रही थीं। उन्होंने वहां बैठी एक बुज़ुर्ग महिला से गिड़गिड़ाकर कहा कि दरवाज़ा बंद कर लो, उन्हें बचा लो।
वो औरत भी डरी हुई थी। वह कुछ नहीं कर सकी। शूटर अंदर घुस आए। गुलशन कुमार पर पंद्रह और गोलियां दाग कर वे चलते बने। पूरा खेल पंद्रह से बीस मिनट तक चला। अंधेरी की उस व्यस्त गली में दिन के उजाले में सब होता रहा, पर कोई आगे नहीं आया। जिस आदमी ने हज़ारों लोगों की मदद की, उसका साथ एक ने भी नहीं दिया। पूरे देश में सदमा था। संसद से लेकर चाय की दुकानों तक सलेम की इस दरिंदगी की चर्चा थी। इंडियन एक्सप्रेस के उसी पत्रकार ने सलेम को दोबारा फोन किया। पूछा, "क्या यही वो मर्डर था जिसकी बात कर रहे थे?"
इस बार सलेम में वो अकड़ नहीं थी। उसके अपने गैंग में बवाल मचा हुआ था। मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से दुबई तक माफिया के लोग भड़के हुए थे। पत्रकार ने महसूस किया कि सलेम बदला हुआ था। उसकी दबंगई और शेखी गायब थी। लेकिन, कुछ देर की खामोशी के बाद उसने जो कहा उसे सुनकर पत्रकार सन्न रहा गया। उसने कहा, "यह मर्डर लाल कृष्ण आडवाणी ने करवाया है। उन्हीं को फोन कर क्यों नहीं पूछ लेते।" यह सुनने के बाद पत्रकार को समझ ही नहीं आया कि सलेम क्या बोल रहा है और इस पर उससे क्या कहा या पूछा जाए!
(एस हुसैन जैदी की किताब डोंगरी टु दुबई: सिक्स डिकेड्स ऑफ द मर्डर माफिया का अंश)