
दाऊद इब्राहिम की कहानी
1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (इमर्जेंसी) लगाया तो नेताओं को ही नहीं, अपराधियों को भी पकड़-पकड़ कर जेल में ठूंसा जाने लगा। दाऊद इब्राहिम भी इनमें एक था। उसे मेंटनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत जेल भेजा गया। लेकिन, यह गिरफ्तारी उसके लिए वरदान साबित हो गई।
जेल में हाजी मस्तान और यूसुफ पटेल की नजर दाऊद पर पड़ी। वे दोनों उस समय सोना-चांदी के सबसे बड़े तस्करों में शुमार थे। उन्हें किसी ऐसे अपराधी की तलाश थी, जो उनका कारोबार संभाल सके, क्योंकि वे 'रिटायर' होना चाह रहे थे। जवान और जुझारू दाऊद में उन दोनों को उम्मीद दिखाई दी। उन्होंने दाऊद को अपने गिरोह में ले लिया।
जेल से निकलने के बाद दाऊद ने अपना नेटवर्क बढ़ाने पर काम शुरू किया। कुछ ही समय में उसने बंबई (अब मुंबई) में अपना जाल फैला लिया।
दाऊद का बढ़ता असर देख कर करीम लाला का पारा हाई हो रहा था। उसने अपने भतीजे समाद खान को दाऊद के पर कतरने के लिए कहा। समाद ने कई बार दाऊद पर फायरिंग की, लेकिन, हर बार वार खाली गया।
आलमजेब और अमीर जद्दा जैसे पठान गैंग के दूसरे गुर्गे भी दाऊद से उलझने लगे। इनके बीच छुरेबाजी, फायरिंग आम बात हो गई। लेकिन, दाऊद का बाल बांका नहीं हो रहा था। हाजी मस्तान ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन कुछ हुआ नहीं।
इस बीच, 1979 में दाऊद एक बार फिर पुलिस के हत्थे चढ़ गया। उसे पुणे की यरवदा जेल में रखा गया। यहां से वह जल्द ही छूट गया, लेकिन 1980 में डोंगरी पुलिस ने उसे फिर गिरफ्तार कर लिया।
जनवरी, 1981 में आलमजेब और अमीर जद्दा ने दाऊद के भाई साबिर को मार डाला। उन्होंने दाऊद को भी मारने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं रहे।
दाऊद ने भाई की मौत का बदला लेने की कसम खा ली। आलमजेब और अमीर जद्दा भाई थे। दोनों गुजरात जाकर छिप गए। दाऊद उनकी तलाश में जुट गया। उसने गुजरात में तस्करों के अपने नेटवर्क के जरिए पता कराने की भी कोशिश की। लेकिन, कुछ पता नहीं चला।
1983 में आलमजेब ने ठाणे और अहमदाबाद में दाऊद को फिर से निशाना बनाया, लेकिन मार नहीं पाया। इस बीच दाऊद ने एक बड़ी साजिश रच ली। उसने पता लगा लिया कि समाद खान ग्रांट रोड पर अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने जाता है। उस समय उस पर हमला करना सबसे आसान होगा।
4 अक्तूबर, 1982 को समाद खान अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गया था। वह जैसे ही बिल्डिंग की लिफ्ट से बाहर निकला, दाऊद और उसके छह गुर्गों ने उसे घेर लिया। सबने उस पर गोलियों की बौछार कर दी। वह वहीं ढेर हो गया। पोस्टमॉर्टम में पता चला कि उसके शरीर में 32 गोलियां धंसी थीं।
1983 में दाऊद फिर गिरफ्तार कर साबरमती सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 21 अगस्त को उसकी रिहाई हुई और 6 सितंबर को उसने साबिर की मौत का बदला पूरा किया।
आमिर जद्दा जेल में बंद था। दाऊद ने 50 हजार रुपये में एक भाड़े का हत्यारा तय किया। वह डेविड परदेसी नाम का एक बेरोजगार युवक था। उन दिनों 500 से 5000 रुपये में आराम से सुपारी किलर मिल जाते थे, लेकिन दाऊद ने डेविड को 50 हजार दिए। उसे अपने घर पर हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी। 6 सितंबर को जब आमिर को पेशी के लिए कोर्ट लाया गया, डेविड ने एकदम करीब से गोली मार कर उसकी हत्या कर दी।
आमिर की हत्या के बाद डेविड और दाऊद को गिरफ्तार कर लिया गया। 1984 में 20 हजार के मुचलके पर दाऊद जमानत पर रिहा हो गया। रिहा होते ही वह दुबई भाग गया। दुबई में हाजी असरफ ने उसे न्योता दिया था। असरफ से उसकी मुलाक़ात अगस्त 1983 में लालू जोगी ने करवाई थी। लालू तस्कर था, जो गुजरात में दाऊद के काम में मदद करता था।
अब दाऊद दुबई में बैठ कर बंबई में तस्करों का सिंडीकेट बनाने लगा। उसने वसई से भाई ठाकुर, तिलक नगर से छोटा राजन, भांडूप से किम बहादुर थापा, जोगेश्वरी से शरद शेट्टी, खालिद शकील और छोटा शकील जैसे गुर्गों को बहाल किया और तस्करी का धंधा बढ़ाता गया।
इस तरह दाऊद ने 'डी कंपनी' खड़ी की। तब वह ड्रग्स का धंधा नहीं करता था। सोना, चांदी, कपड़े, इलेक्ट्रोनिक सामान की तस्करी के साथ-साथ 'डी कंपनी' के गुर्गे मुंबई के कारोबारियों से पैसे भी वसूलने लगे। वे बड़ी रकम लेकर कारोबारियों के झगड़े भी सुलझाने लगे। इसे उनकी जुबान में 'मैटर पटाना' कहा जाता था। इन सब धंधों से 'डी कंपनी' की कमाई 1992 में 20 करोड़ रुपये महीने के करीब पहुंच गई थी।
(एस हुसैन जैदी की किताब 'ब्लैक फ्राइडे - द ट्रू स्टोरी ऑफ द बॉम्बे बॉम्ब ब्लास्ट्स' का अंश)
Updated on:
12 Mar 2026 08:16 am
Published on:
12 Mar 2026 08:15 am
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