भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली नाविक (NavIC) उपग्रहों की कमी और परमाणु घड़ियों की खराबी के कारण संकट में है। न्यूनतम संचालन के लिए चार उपग्रह जरूरी हैं, जबकि फिलहाल केवल तीन सक्रिय हैं। नए उपग्रहों के प्रक्षेपण से ही प्रणाली की पूर्ण क्षमता बहाल होने की उम्मीद है।
NavIC: भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली ‘नाविक’ (NavIC) इस समय गंभीर संकट का सामना कर रही है। दशकों के वैज्ञानिक प्रयास और अरबों रुपये की लागत से विकसित यह प्रणाली भारत और उसके आसपास के क्षेत्रों को सटीक नेविगेशन और पोजिशनिंग सेवाएं प्रदान करने के लिए बनाई गई थी। लेकिन हाल ही में पहली पीढ़ी के उपग्रह आईआरएनएसएस-1एफ के सेवा से बाहर हो जाने के बाद इसकी परिचालन क्षमता लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई है।
नाविक प्रणाली को न्यूनतम सेवाएं प्रदान करने के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों की आवश्यकता होती है, जबकि पूर्ण क्षमता के लिए सात उपग्रहों का संचालन जरूरी माना जाता है। वर्तमान समय में केवल तीन उपग्रह सक्रिय बचे हैं, जिनमें से एक अपनी निर्धारित सेवा अवधि पूरी करने के करीब है। इससे प्रणाली की स्थिरता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
वर्ष 2013 से 2018 के बीच इसरो ने इस प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से कुल नौ उपग्रह प्रक्षेपित किए थे। हालांकि इनमें से एक उपग्रह का प्रक्षेपण विफल हो गया था। इसके अलावा पांच उपग्रहों में लगी परमाणु घड़ियां (Atomic Clocks) भी खराब हो गईं। नेविगेशन प्रणाली में परमाणु घड़ियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से सटीक समय मापन संभव होता है। सटीक समय के बिना उपग्रहों द्वारा प्रदान की जाने वाली लोकेशन और नेविगेशन सेवाएं सही ढंग से काम नहीं कर पातीं।
पहली पीढ़ी के उपग्रहों में अब केवल आईआरएनएसएस-1बी और आईआरएनएसएस-1एल ही परिचालन योग्य बचे हैं। इनमें से आईआरएनएसएस-1बी लगभग 12 वर्ष की सेवा अवधि पूरी कर चुका है और किसी भी समय निष्क्रिय हो सकता है। इससे नाविक प्रणाली के भविष्य को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों के तहत एनवीएस-01 मिशन सफल रहा था, लेकिन एनवीएस-02 मिशन अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। वर्तमान योजना के अनुसार इसरो आने वाले वर्षों में पांच नए उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की तैयारी कर रहा है, ताकि नाविक प्रणाली को फिर से पूर्ण क्षमता में संचालित किया जा सके और भारत की स्वदेशी नेविगेशन क्षमता को मजबूत बनाया जा सके।