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अबॉर्शन के लिए पति की अनुमति जरूरी नहीं, महिलाओं के हक में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गर्भपात (Abortion) के लिए पति की अनुमति अनिवार्य नहीं है और प्रजनन का अधिकार महिला की निजी स्वतंत्रता है।
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Jan 09, 2026
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कोर्ट। (फाइल फोटो)

दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने कहा है कि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। इससे मानसिक पीड़ा बढ़ती है। 14 सप्ताह में गर्भपात कराने पर पति ने आपराधिक मामला दर्ज कराया था।

कोर्ट ने पत्नी को राहत दी है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि वैवाहिक मतभेद की स्थिति में महिला को गर्भपात कराने का अधिकार है। प्रजनन से जुड़ा फैसला लेना महिला की निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत गर्भपात के लिए पति की अनुमति जरूरी नहीं है।

अगर महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो उसे मजबूर करना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि दंपती साथ रह रहे थे, इसलिए वैवाहिक विवाद नहीं था। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक तनाव केवल अलग रहने या कानूनी लड़ाई शुरू होने के बाद ही नहीं माना जा सकता।

Updated on:
09 Jan 2026 04:14 am
Published on:
09 Jan 2026 04:10 am