
लुटियंस दिल्ली स्थित करीब एक सदी पुराने दिल्ली रेस क्लब को अपनी जमीन और परिसर को लेकर अदालत से तत्काल राहत नहीं मिल सकी। पटियाला हाउस कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें क्लब को 15 दिन के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने माना कि क्लब फिलहाल ऐसा प्रथमदृष्टया आधार पेश नहीं कर पाया, जिससे 11 अगस्त 2026 के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जा सके।
पटियाला हाउस कोर्ट के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (PDSJ) पितांबर दत्त ने मंगलवार को दिल्ली रेस क्लब की उस अंतरिम अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें क्लब ने उसे परिसर खाली करने के लिए दिए गए सरकारी आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी।
मामला केंद्र सरकार बनाम दिल्ली रेस क्लब से जुड़ा है। 11 अगस्त 2026 को एस्टेट ऑफिसर ने सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम के तहत क्लब को लुटियंस दिल्ली स्थित अपनी संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया था। आदेश के मुताबिक क्लब को 15 दिन की अवधि दी गई थी।
दिल्ली रेस क्लब राजधानी के सेंट्रल गोल्फ लिंक रोड पर स्थित है और प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के सामने का इलाका होने के कारण इसकी लोकेशन बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह क्लब घुड़दौड़ से जुड़ी पुरानी संस्थाओं में शामिल है और इसकी स्थापना को एक सदी से अधिक समय बीत चुका है।
यही वजह है कि परिसर खाली करने का विवाद सिर्फ एक संपत्ति संबंधी मामला नहीं है, बल्कि राजधानी के प्रमुख इलाकों में सरकारी जमीन के इस्तेमाल और पुराने लीज अधिकारों से जुड़े सवालों को भी सामने लाता है।
क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुहैल दत्त ने अदालत में दलील दी कि एस्टेट ऑफिसर की 11 अगस्त की कार्रवाई उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी। उनका कहना था कि क्लब ने बार-बार मांग करने के बावजूद संबंधित वादपत्र की प्रति हासिल नहीं की थी।
क्लब की ओर से यह भी कहा गया कि उसे अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। इसी आधार पर कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया।
क्लब ने एक और महत्वपूर्ण कानूनी दलील पेश की। उसके वकील ने कहा कि इसी संपत्ति से जुड़े पुराने विवाद में 1999 में जारी शो-कॉज नोटिस को दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है। ऐसे में उसी विवाद को दोबारा उठाना ‘रेस जुडिकाटा’ के सिद्धांत के दायरे में आता है।
सरल शब्दों में कहें तो रेस जुडिकाटा का मतलब है कि जिस मुद्दे पर सक्षम अदालत पहले ही अंतिम निर्णय दे चुकी हो, उसे उन्हीं पक्षों के बीच दोबारा उसी रूप में नहीं उठाया जा सकता।
क्लब ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए किराये के भुगतान और 2013 में लीज बढ़ाने के लिए जमा की गई रकम का भी उल्लेख किया। क्लब का तर्क था कि इन परिस्थितियों से यह संकेत मिलता है कि लीज को आगे बढ़ाया गया था और उसका कब्जा महज अनधिकृत कब्जे के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।
केंद्र सरकार की ओर से सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसिल (CGSC) आशीष के. दीक्षित ने अदालत में कहा कि 1994 के बाद क्लब की लीज का कोई नवीनीकरण नहीं हुआ।
सरकार के मुताबिक इसके बाद क्लब का कब्जा महीने-दर-महीने किराये की व्यवस्था पर था। सरकार ने यह भी कहा कि क्लब को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे और उसे जवाब दाखिल करने के लिए कई मौके भी दिए गए, लेकिन उसने उन अवसरों का प्रभावी इस्तेमाल नहीं किया।
रेस जुडिकाटा की दलील पर भी अदालत ने क्लब को राहत नहीं दी। अदालत ने पाया कि 1999 में जारी किया गया पुराना नोटिस लीज की स्थिति तय करने या लीज की re-entry clause को लागू करने के आधार पर जारी नहीं हुआ था।
इसलिए अदालत ने माना कि पुराने मामले के आधार पर मौजूदा कार्रवाई को स्वतः रोकने का आधार नहीं बनता।
अदालत के फैसले का एक अहम पहलू क्लब की ओर से किए जा रहे किराये के भुगतान से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लीज की अवधि समाप्त होने के बाद किराया देते रहने से अपने आप लीज का नवीनीकरण साबित नहीं होता।
यानी किराया स्वीकार किया जाना और लीज का औपचारिक रूप से नवीनीकरण होना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हो सकती हैं। इसी अंतर ने क्लब की दलील को कमजोर किया।