विजयादशमी-दशहरा पर जब पूरे देश में भक्ति, हर्ष और उल्लास का माहौल है, तब झारखंड और पश्चिम बंगाल में रहने वाली असुर जनजाति के लिए यह शोक का वक्त है।
Dussehra 2025: जब पूरा देश विजयादशमी और दशहरा के उत्सव में डूबा होता है, झारखंड और पश्चिम बंगाल की असुर जनजाति के लिए यह समय शोक और स्मरण का होता है। असुर जनजाति महिषासुर को अपना आराध्य पितृपुरुष मानती है और उनकी मान्यता है कि उनका छलपूर्वक संहार किया गया। नवरात्र से दशहरा तक यह समुदाय शोक मनाता है और इस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं करता। पहले लोग इस अवधि में घर से बाहर निकलने से भी परहेज करते थे।
झारखंड के गुमला, लोहरदगा, पलामू, लातेहार और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, मिदनापुर जैसे जिलों में असुर जनजाति की अच्छी-खासी आबादी है। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर के केंदाशोल और आसपास के गांवों में सप्तमी से दशमी तक लोग ‘हुड़ुर दुर्गा’ के रूप में महिषासुर की मूर्ति स्थापित कर पूजा करते हैं। वहीं, झारखंड में असुर दीपावली की रात मिट्टी का पिंड बनाकर महिषासुर और पूर्वजों को याद करते हैं। उनकी मान्यता है कि महिषासुर महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे, इसलिए देवी दुर्गा के छल से उनकी हत्या हुई।
झारखंड के गुमला जिले के डुमरी प्रखंड में टांगीनाथ धाम को असुर महिषासुर का शक्ति स्थल मानते हैं। हर 12 वर्ष में एक बार भैंसा (काड़ा) की सवारी की पूजा की परंपरा आज भी कायम है। गुमला के बिशुनपुर, घाघरा, चैनपुर और लातेहार के महुआडाड़ में भैंसा पूजा प्रचलित है।
मानव विज्ञानियों ने असुरों को प्रोटो-आस्ट्रेलाइड समूह का हिस्सा माना है। ऋग्वेद, महाभारत और अन्य ग्रंथों में असुरों का उल्लेख है। इतिहासकारों जैसे बनर्जी और शास्त्री ने असुरों को पूर्ववैदिक और वैदिक काल में शक्तिशाली समुदाय बताया है। एथनोलॉजिस्ट एससी राय ने 80 वर्ष पहले झारखंड में असुरों के किले और कब्रों की खोज की थी। असुरों को सिन्धु सभ्यता, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति से जोड़ा जाता है। वे ताम्र, कांस्य और लौह युग के सहयात्री माने जाते हैं।
झारखंड में असुर आज भी मिट्टी से लौहकण निकालकर परंपरागत तरीके से लोहे के सामान बनाते हैं। संताल परगना के गोड्डा, राजमहल और दुमका में कुछ जनजातियां रावण को अपना पूर्वज मानती हैं और नवरात्र में दुर्गा पूजा या रावण वध की परंपरा से दूरी रखती हैं।