
Social Impact Report : देश की राजनीति में इन दिनों एक नया शब्द गूंज रहा है- SIR (सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट)। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के एक ताजा फैसले ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सरकार ने 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तीसरे चरण को हरी झंडी दे दी है। इसके तहत करीब 37 करोड़ मतदाताओं का वेरिफिकेशन और डेटा असेसमेंट किया जाना है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले इस भारी-भरकम कवायद की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई गहरी चुनावी रणनीति छिपी है? आइए विस्तार से समझते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIR) एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके जरिए सरकार अपनी बड़ी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के सामाजिक प्रभाव का आकलन करती है। यह जांचा जाता है कि सरकारी नीतियों का जमीन पर कितना असर हुआ। जनता के जीवन स्तर में क्या सुधार आया। किन क्षेत्रों में नाराजगी है और कहाँ सुधार की गुंजाइश है। अभी तक इसे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (जैसे हाईवे या बांध निर्माण) के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर सीधे तौर पर वोटर वेरिफिकेशन और फीडबैक से जोड़ दिया गया है।
इस प्रोजेक्ट का पैमाना बेहद विशाल है। 16 राज्यों के 37 करोड़ वोटरों तक पहुंचना कोई मामूली काम नहीं है। इस सूची में पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्य भी शामिल हैं, जहाँ आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी आबादी का वेरिफिकेशन करने के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
मतदाता सूची में मौजूद विसंगतियों को दूर करना और यह सुनिश्चित करना कि डेटा पूरी तरह सटीक हो।
सरकारी योजनाओं की पहुंच हो यानि यह देखना कि क्या लाभार्थियों तक लाभ पहुंच रहा है या बीच में ही अटक जा रहा है।
पंजाब के मैदानी इलाकों से लेकर उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ों तक, सरकारी मशीनरी अब सक्रिय मोड में है। इन दोनों राज्यों को इस फेज में शामिल करना 'मास्टरस्ट्रोक' माना जा रहा है। चुनाव से पहले सरकार को यह पता चल जाएगा कि जनता की असली 'नब्ज' क्या है। अगर किसी क्षेत्र में नाराजगी दिखती है, तो रिपोर्ट के आधार पर सरकार समय रहते सुधार कर सकती है, जिससे विपक्ष के मुद्दों की धार कम की जा सके।
यह कदम भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब चुनाव केवल रैलियों और नारों के दम पर नहीं, बल्कि सटीक डेटा के दम पर लड़े जा रहे हैं। SIR की रिपोर्ट सरकार को यह समझने में मदद करेगी कि कौन सी विशेष योजना (जैसे उज्ज्वला, किसान सम्मान निधि आदि) वोट बैंक में बदल रही है ? स्थानीय स्तर पर कौन से मुद्दे हावी हैं? किस वर्ग या समुदाय के बीच पैठ बढ़ाने की जरूरत है?
इस विशाल सर्वे के लिए केवल सरकारी कर्मचारी काफी नहीं होंगे। SIR फेज-3 के आदेश से रोजगार के नए द्वार भी खुलेंगे। फील्ड इनवेस्टिगेटर्स भी अहम कारक है। हजारों युवाओं को फील्ड वर्क के लिए नियुक्त किया जा सकता है। डेटा एक्सपर्ट्स के तहत डेटा कलेक्शन और एनालिसिस के लिए प्रोफेशनल्स की भारी मांग होगी। सर्वे करने वाली निजी और सरकारी एजेंसियों के लिए यह एक बड़ा प्रोजेक्ट साबित होगा।
बहरहाल, विपक्ष इस कदम को 'सरकारी मशीनरी का चुनावी इस्तेमाल' बता सकता है, जबकि सत्ता पक्ष इसे 'पारदर्शी और जवाबदेह शासन' का हिस्सा कह रहा है। सच जो भी हो, लेकिन एक बात तय है-37 करोड़ वोटरों का यह वेरिफिकेशन आने वाले चुनावों की दिशा और दशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। क्या यह सर्वे सिर्फ विकास का पैमाना है या सत्ता की चाबी हासिल करने का एक वैज्ञानिक तरीका? इसका जवाब तो सर्वे की रिपोर्ट और उसके बाद होने वाले चुनावी नतीजे ही देंगे।