
US Justice Department: गौतम अडानी (Gautam Adani) के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को वापस लेने के अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) के फैसले को लेकर कई वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि उपलब्ध एविडेंस कमजोर थे और ऐसे में अदालत के सामने इस मामले को खारिज करने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं बचता।
सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे (Harish Salve) ने कहा कि बाइडेन प्रशासन के दौरान लगातार भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई। उनके मुताबिक, अमेरिका के कुछ सांसद लगातार भारत को निशाना बना रहे थे और विभिन्न मामलों के जरिए दबाव बनाने का प्रयास कर रहे थे।
साल्वे ने कहा कि इस मामले का मकसद केवल नेम एंड शेम (Name and Shame) यानी किसी का नाम सार्वजनिक कर उसे बदनाम करना था। उनका मानना है कि शुरुआत से ही इस केस के मुकदमे तक पहुंचने की संभावना बेहद कम थी। अब उन्हें उम्मीद है कि अदालत इस मामले को पूरी तरह बंद कर देगी।
अमेरिकी वकील जिम वाल्डेन (Jim Walden) ने कहा कि DOJ की ओर से अदालत में दिया गया जवाब काफी मजबूत और स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि जब किसी सरकारी फैसले पर पक्षपात के आरोप लगाए जाते हैं, तो न्याय विभाग का अदालत के सामने अपने फैसले के कारण बताना सामान्य प्रक्रिया होती है। वाल्डेन के मुताबिक, अब अदालत के सामने पूरी तस्वीर साफ है और ऐसे में इस मामले को खारिज करना ही सबसे तार्किक कदम होगा। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने करीब दो साल तक इस मामले की जांच की, जबकि भारतीय एजेंसियों ने भी स्वतंत्र और पेशेवर तरीके से जांच की और उन्हें किसी तरह की अनियमितता नहीं मिली।
वाल्डेन ने यह भी कहा कि अमेरिकी कानून में पहले से ऐसी कई न्यायिक मिसालें मौजूद हैं, जिनमें साफ किया गया है कि अमेरिका को दूसरे देशों में हुई कथित घटनाओं पर आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। उनके अनुसार, यह मामला किसी गंभीर आपराधिक अपराध से ज्यादा अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से जुड़ा विवाद था।
एडवोकेट विजय अग्रवाल (Vijay Aggarwal) का कहना है कि शुरुआत से ही यह मामला कानूनी रूप से ज्यादा मजबूत नहीं था। उनके मुताबिक, DOJ ने भी माना है कि जांच के दौरान मिले एविडेंस शुरुआती अनुमान की तुलना में काफी कमजोर निकले। उन्होंने कहा कि सबसे अहम बात यह रही कि किसी ठोस वित्तीय नुकसान का भी कोई प्रमाण सामने नहीं आया। ऐसे में अभियोजन का आधार ही कमजोर हो जाता है। अग्रवाल ने बताया कि अदालत खुद किसी पर मुकदमा नहीं चलाती। अदालत तभी सुनवाई करती है जब अभियोजन पक्ष मुकदमा आगे बढ़ाने का फैसला करता है। यदि पर्याप्त सबूत नहीं हों और नुकसान का प्रमाण भी न मिले, तो ऐसे मामलों में केस आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाता है।
अमेरिका की एक लॉ फर्म के लिटिगेशन एंड डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन ग्रुप के पार्टनर और अमेरिकी वकील बेंजामिन ए. जियानफोर्टी (Benjamin A. Gianforti) ने कहा कि DOJ को इस मामले में मुकदमा वापस लेने का पूरा अधिकार था। उन्होंने कहा कि न्याय विभाग ने अपने फैसले के समर्थन में कई ठोस कारण भी अदालत के सामने रखे हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि फिलहाल इस मामले को आगे न बढ़ाना उचित माना गया। जियानफोर्टी ने यह भी कहा कि यह मामला कुछ असाधारण परिस्थितियों वाला था, इसलिए अदालत ने अतिरिक्त जानकारी मांगी थी। हालांकि, उनका मानना है कि अभियोजन से जुड़ी आंतरिक चर्चाएं गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त (Privileged) होती हैं और उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए।
गौतम अडानी से जुड़े इस मामले में अमेरिकी न्याय विभाग ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए केस वापस लेने के फैसले का बचाव किया है। DOJ का कहना है कि उपलब्ध एविडेंस अभियोजन को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। वहीं, कई कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में अदालत इस मामले को खारिज कर सकती है।