लोगों के खान-पान का तरीका बदल रहा है। यही कारण है कि लोगों की थाली से अनाज घट रहा है और उसकी जगह प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, फल-मेवों का सेवन बढ़ रहा है।
लोगों के खान-पान का तरीका बदल रहा है। यही कारण है कि लोगों की थाली से अनाज घट रहा है और उसकी जगह प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, फल-मेवों का सेवन बढ़ रहा है। इसके साथ ही लोग स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं, जिसके चलते थाली से चीनी, नमक और तेल भी घट रहा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लोग परंपरागत भोजन की जगह अधिक पौष्टिक और रेडी-टू-ईट भोजन को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। पिछले दो दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति अनाज का मासिक उपभोग 3 किलोग्रम और शहरी क्षेत्रों में 2 किलोग्रम घट गया है। वर्ष 2000 के मुकाबले वर्ष 2022-23 में अनाज का सेवन ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों 20 प्रतिशत कम हुआ है।
लोग अनाज की जगह भोजन के अन्य विकल्पों को तरजीह दे रहे हैं। इनमें अंडा, फिश, मीट, फल-मेवों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो का सेवन बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में फल एवं मेवों पर खर्च 1.72 प्रतिशत से बढक़र 3.73 प्रतिशत, प्रसंस्कृत खाद्य पर 4.91 प्रतिशत से बढक़र 9.62 प्रतिशत हो गया। वहीं अंडा-मछली और मांस पर खर्च 3.32 प्रतिशत से बढक़र 4.91 प्रतिशत हो गया है। जबकि शहरी क्षेत्रों में प्रसंस्कृत खाद्य पर खर्च 6.35 प्रतिशत से बढक़र 10.64 प्रतिशत, फल-मेवों पर 2.42 प्रतिशत से बढक़र 3.81 प्रतिशत और अंडा-मछली-मांस पर खर्च 3.13 प्रतिशत से बढक़र 3.57 प्रतिशत हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार 2022-23 में ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज पर प्रति व्यक्ति मासिक व्यय महज 185 रुपए और शहरों में 235 रुपए है, जो मौजूदा कुल व्यय का क्रमश: 4.91 प्रतिशत और 3.64 प्रतिशत है। जबकि यदि 1999-2000 के आंकड़ों को देखें तो उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता अनाज पर 22.16 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 12.35 प्रतिशत खर्च करता था। इसी तरह 2022-23 के दौरान प्रति व्यक्ति मासिक उपभोक्ता व्यय ग्रामीण क्षेत्रों में 2008 रुपए और शहरी क्षेत्रों में 3510 रुपए दर्ज किया गया है। जबकि 1999-2000 में यह क्रमश: 978 रुपए और 1823 रुपए था।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दूध, दाल और सब्जियों पर होने वाले व्यय में कमी आई है। इसका कारण स्पष्ट नहीं है लेकिन इनके दामों में इजाफा होना एक प्रमुख वजह हो सकती है। अच्छी बात यह है कि ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में चीनी और नमक पर व्यय कम हो रहा है। मधुमेह और उच्च-रक्तचाप की बढ़ती बीमारी के मद्देनजर यह महत्वपूर्ण है। गांवों में चीनी-नमक पर होने वाला व्यय 2.60 प्रतिशत से घटकर 0.93 प्रतिशत रह गया। जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 1.80 प्रतिशत से घटकर 0.60 प्रतिशत रह गया है। तेल यानी वसा को कोलेस्ट्रोल बढऩे का एक प्रमुख कारण माना जाता है। शहरी क्षेत्रों में खाद्य तेल पर होने वाला व्यय 3.14 प्रतिशत से घटकर 2.37 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 3.74 प्रतिशत से घटकर 3.59 प्रतिशत रह गया।