होली के रंगों के बहाने कविता सत्ता और राजनीति पर व्यंग्य करती है। अहंकार, टकराव और गलत फैसलों का रंग चढ़ता है, लेकिन समय आने पर वही रंग उतरकर सियासी पतन की तस्वीर दिखाता है।
औंधे फेस जमीन पर, लुढक़े ट्र्प जनाब।
टैरिफ चाल अवैध है, बतलायो जज साब।।
बतलायो जज साब, उधर यूरोप तना है।
ग्रीनलैंड का लैंड, बचाने ढाल बना है।।
सभी मादुरो नाहिं, कि तोड़ो जैसे पौधे।
उतर जाएगा रंग, गिरोगे मुंह से औंधे।।
मुखड़ा दूजा सामने, पीछे है कछु और।
अपराधी की तान पर, नाचे बनकर मोर।
नाचे बनकर मोर, गेंद ज्यों अंगुली घूमी।
जैफरी एपसटीन, कुटिल मन मुख मासूमी।
या राजा या प्रिंस, साख का गुलशन उजड़ा।
हर डाली हरदीप, छिपे मुखड़ा दर मुखड़ा।।
भारत यूएस ट्रेड में, फ्रेंड भयो अनफ्रेंड।
मंत्री संत्री या कहैं, असमंजस का ट्रेंड।।
असमंजस का ट्रेंड, बात टालत जयशंकर।
गोयल भी ग्भीर, गिनाकर नियम धुरंधर।।
फल दाने घी तेल, न जाने या या लावत।
अमरीका रंगदार, दुकानें लाया भारत।।
तेजी से रंग बदलते इस दौर में कहीं डॉनल्ड ट्रंप का ‘आइलैंड राग’ और टैरिफ की ठसक, तो कहीं नरेन्द्र मोदी-राहुल गांधी की रंगभरी ‘अनकॉ्प्रोमाइज्ड’ टक्कर... खेल का मैदान हो या कारोबार का चौक, हर गहमागहमी पर फागुनी छाप... चित्र-शिल्पी शिरीष श्रीवास्तव की कूंची और फागुनी कलमकार राम नरेश गौतम की रंगरेज लेखनी ने होली के रंगों में मुस्कान की ऐसी मिठास घोली है जो आपको भिगोएगी भी और गुदगुदाएगी भी...