
1996 में मई का महीना था। लोक सभा के चुनाव हो चुके थे। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना कर चुनाव लड़ा था। राम जन्मभूमि आंदोलन के चलते पार्टी का ग्राफ काफी ऊपर था। 10 मई को नतीजे आने वाले थे। कांग्रेस को नतीजों का अनुमान था।
नतीजे आने से एक दिन पहले, 9 मई को आगे की रणनीति तय करने के लिए प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के घर पर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक चल रही थी। प्रणव मुखर्जी अपनी किताब 'द कोलिशन ईयर्स 1996-2012) में लिखते हैं कि कांग्रेस की मंशा थी कि अगली सरकार बनाने के लिए एक गठबंधन तैयार किया जाए और उसे बाहर से समर्थन दिया जाए।
| क्रम संख्या | दल का नाम (Party) | कुल प्राप्त मत (Votes) | मत प्रतिशत (Votes %) | जीती गईं सीटें (Seats) |
| 1 | भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 6,79,50,851 | 20.29% | 161 |
| 2 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 9,64,55,493 | 28.80% | 140 |
| 3 | जनता दल (JD) | 2,70,70,340 | 8.08% | 46 |
| 4 | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPI-M) | 2,04,96,810 | 6.12% | 32 |
| 5 | तमिल मानिला कांग्रेस (TMC) | 73,39,982 | 2.19% | 20 |
| 6 | समाजवादी पार्टी (SP) | 1,09,89,241 | 3.28% | 17 |
| 7 | द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) | 71,51,381 | 2.14% | 17 |
| 8 | तेलुगु देशम पार्टी (TDP) | 99,31,826 | 2.97% | 16 |
| 9 | शिव सेना (SS) | 49,89,994 | 1.49% | 15 |
| 10 | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 65,82,263 | 1.97% | 12 |
| 11 | बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 1,34,53,235 | 4.02% | 11 |
| 12 | समता पार्टी | 72,56,086 | 2.17% | 8 |
| 13 | शिरोमणि अकाली दल (SAD) | 25,34,979 | 0.76% | 8 |
| 14 | असम गण परिषद (AGP) | 25,60,506 | 0.76% | 5 |
| 15 | रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) | 21,05,469 | 0.63% | 5 |
| 16 | निर्दलीय (Independents) | 2,10,41,557 | 6.28% | 9 |
| 17 | ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) (AIIC-T) | 49,03,070 | 1.46% | 4 |
| 18 | ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (AIFB) | 12,79,492 | 0.38% | 3 |
| 19 | हरियाणा विकास पार्टी (HVP) | 11,56,322 | 0.35% | 3 |
| 20 | इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) | 7,57,316 | 0.23% | 2 |
| 21 | झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) | 12,87,072 | 0.38% | 1 |
| 22 | कर्नाटक कांग्रेस पार्टी (KCP) | 5,81,868 | 0.17% | 1 |
| 23 | केरल कांग्रेस (मनी) (KC-M) | 3,82,319 | 0.11% | 1 |
| 24 | ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) | 3,40,070 | 0.10% | 1 |
| 25 | मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस (MPVC) | 3,37,539 | 0.10% | 1 |
| 26 | ऑटोनॉमस स्टेट डिमांड कमेटी (ASDC) | 1,80,112 | 0.05% | 1 |
| 27 | महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी (MGP) | 1,29,220 | 0.04% | 1 |
| 28 | सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (SDF) | 1,24,218 | 0.04% | 1 |
| 29 | यूनाइटेड गोअन्स डेमोक्रेटिक पार्टी (UGDP) | 1,09,346 | 0.03% | 1 |
| — | मनोनीत एंग्लो-इंडियन | — | — | 2 |
| 📊 | कुल वैध मत / सीटें (Grand Total) | 33,48,73,286 | 100.00% | 545 |
नतीजे आए तो अनुमान के मुताबिक ही निकले। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। लेकिन, बहुमत उसके पास भी नहीं था। तय था कि गठबंधन सरकार ही बननी है। कांग्रेस अपनी योजना पर काम कर ही रही थी कि पता चला राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के नाते अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दे दिया है।
बीजेपी के पास 161 और कांग्रेस के पास 140 सांसद थे। 46 सीटें जीत कर जनता दल तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। जनता दल और अन्य पार्टियों से बना संयुक्त मोर्चा या कांग्रेस में से कोई बीजेपी को समर्थन देने वाला तो था नहीं। ऐसे में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा का वाजपेयी को न्योता देने का फैसला आलोचनाओं और विवादों का शिकार हो गया।
आगे चल कर खुद राष्ट्रपति बने प्रणव मुखर्जी ने निजी तौर पर शंकर दयाल शर्मा के फैसले को 'काफी जोखिम भरा' बताया था। राष्ट्रपति के फैसले पर कानूनविद भी बंट गए थे। एक खेमा सबसे बड़ी पार्टी को मौका दिए जाने को सही बता रहा था, जबकि दूसरे का कहना था कि राष्ट्रपति को सरकार की स्थिरता का पहलू भी ध्यान में रखना चाहिए था।
शर्मा से पहले आर वेंकटरमन राष्ट्रपति थे। उन्होंने भी 1989 और 1991 में सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाया था। लेकिन, उनके फैसले की आलोचना नहीं हुई थी, क्योंकि दोनों ही मौकों पर प्रधानमंत्री पद के दो-दो दावेदार नहीं थे। 1989 में वीपी सिंह और 1991 में पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने थे।
1989 के मामले में वेंकटरमन ने अपने संस्मरण में लिखा कि उन्होंने खुद राजीव गांधी को सलाह दी थी कि सरकार बनाने का दावा मत करें, क्योंकि लोक सभा में बहुमत नहीं जुटा पाएंगे।
1996 में स्थिति अलग थी। 15 मई को वाजपेयी पहली बार देश के भाजपाई प्रधानमंत्री बन तो गए, लेकिन लोक सभा में बहुमत नहीं जुटा पाए। 27 मई को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
वाजपेयी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने अपनी नीति पर अमल किया। विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री के लिए चुना गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब एचडी देवगौड़ा के नाम पर सहमति बनी। जून के पहले सप्ताह में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी और देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने।
अगले साल राष्ट्रपति के रूप में शंकर दयाल शर्मा का कार्यकाल पूरा हो गया, लेकिन उनका 1996 का वह फैसला हमेशा के लिए विवादित रह गया।