राष्ट्रीय

इंदिरा गांधी  ने ‘लड़के’ की कहानी के जरिए संघ पर यूं कसा था तंज  

Indira Gandhi On RSS: राहुल गांधी के RSS पर हमलों के बीच इंदिरा गांधी की किताब ‘इंदिरा गांधी–माय ट्रुथ’ में दर्ज उनके विचार चर्चा में हैं। जानिए आपातकाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मीडिया की स्वतंत्रता और विपक्ष की राजनीति को लेकर इंदिरा गांधी ने क्या लिखा था।
5 min read
• •
Oct 21, 2026
indira gandhi on rss rahul gandhi emergency book my truth
Indira Gandhi। Photo-ANI

Indira Gandhi On RSS: कांग्रेस लीडर राहुल गांधी जब तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधते रहते हैं। उनकी मानें तो आरएसएस धर्म के नाम पर देश को बांटने वाली विचारधारा से प्रेरित लोगों का संगठन है।  वैसे आरएसएस को लेकर राहुल की दादी इंदिरा गांधी की भी सोच इससे अलहदा नहीं थी। इंदिरा आरएसएस को लेकर अक्सर एक कहानी सुनाया करती थीं, जिसमें एक लड़का अपने माता-पिता की हत्या कर देता है। इस बात का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा Indira-Gandhi-My-Truth में भी किया है। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ और 27 जून को इंदिरा गांधी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में बताया कि किस वजह से उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। उन्होंने कहा- हिंसा और नफरत का ऐसा माहौल बना दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप एक केंद्रीय मंत्री की हत्या हुई और मुख्य न्यायाधीश पर भी हमले का प्रयास हुआ। विपक्षी दलों ने देशव्यापी घेराव, आंदोलन, मजदूरों, पुलिस और रक्षा बलों को उकसाने की योजना तैयार की। इसका उद्देश्य केंद्र सरकार को पूरी तरह पंगु बना देना था। विपक्ष के एक नेता ने तो यहां तक कहा था कि सशस्त्र बलों को उन आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए, जिन्हें वे गलत समझते हैं। इससे सार्वजनिक व्यवस्था को गंभीर खतरा पैदा होता और अर्थव्यवस्था को ऐसा नुकसान पहुंचता, जिसकी भरपाई असंभव थी। इसे रोकना जरूरी था। 

CPI से मतभेद बन गए थे मनभेद

‘इंदिरा गांधी – माय ट्रुथ’ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के बारे में भी काफी कुछ लिखा है। इंदिरा गांधी ‘संघ’ को पसंद नहीं करती थीं और CPI से उनके मतभेद मनभेद में बदल गए थे। इसकी वजह बताई जाती है कि एक प्रशिक्षण शिविर में इंदिरा गांधी द्वारा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर की गई टिप्पणी। हालांकि, इंदिरा ने सभी स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने CPI पर शाब्दिक हमला बोला। किताब में उन्होंने लिखा है- मैंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर कोई तीखा हमला नहीं किया था। मैं केवल घटनाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखना चाहती थी। मैंने बाहर सार्वजनिक रूप से नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षण शिविर में केवल अपने कार्यकर्ताओं के सामने कुछ बातें कहीं थीं। मैं यह कहना चाहती थी कि हालांकि वे हमारे 10-सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करते हैं और उसे प्रगतिशील मानते हैं, लेकिन समय-समय पर उनके विचार मेरे और मेरे पिता के विचारों से पूरी तरह अलग रहे हैं। इसलिए उन्हें इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस मामले में एक गलतफहमी यह थी कि हमारे कुछ तथाकथित वामपंथियों ने कम्युनिस्ट पार्टी के सामने घटनाओं का एक विशेष रूप प्रस्तुत किया और पार्टी ने उसे स्वीकार कर लिया। वास्तव में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने उस समय हमसे संघर्ष करने का मन बना लिया था। अगर वे वास्तव में सहयोग करना चाहते, तो हम बैठकर बातचीत कर सकते थे और मतभेदों को सुलझाने की कोशिश कर सकते थे। वे मुझसे मिलने आए भी थे, लेकिन वे बातचीत करने और समस्या का समाधान खोजने के बजाय आक्रामक रवैये में आए और मुझ पर चिल्लाने लगे।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर यूं कसा था तंज

इंदिरा गांधी ने आपातकाल पर अपनी सरकार का बचाव करते हुए किताब में लिखा है- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे कुछ संगठन हैं, जो मुस्लिमों और ईसाइयों के प्रबल विरोधी हैं। वे पर्दे के पीछे काम करते हैं और उनके गुप्त सहयोगी भी हैं। वे अपने नापाक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। जिनकी विचारधारा हिंसा एवं अव्यवस्था पर आधारित हो, वे लोकतांत्रिक नहीं हो सकते। ऐसे लोगों के मुंह से ‘लोकतंत्र’ शब्द सुनकर मुझे उस लड़के की कहानी याद आती है, जिसने अपने माता-पिता की हत्या कर दी थी, लेकिन यह कहकर दया की मांग की कि वह अनाथ है। यह एक असाधारण स्थिति थी। यदि विपक्षी मोर्चे को देश को ठप करने की अपनी योजना पर अमल करने दिया जाता, तो गंभीर संकट पैदा हो जाता।

मीडिया से नाराज थीं इंदिरा गांधी

इंदिरा गांधी उस दौर में मीडिया से भी काफी नाराज थीं। उन्हें लगता था कि मीडिया विपक्षी दलों के इशारे पर चल रहा है और सरकार के खिलाफ है। कांग्रेस से जुड़ी अच्छी खबरों को दबाया जाता है, जबकि विपक्षी दलों की खबरों को प्राथमिकता दी जाती है। किताब में लिखा है- समाचार-पत्रों पर प्रतिबंधात्मक नियम लागू करने पड़े, इससे मुझे खुशी नहीं हुई। लेकिन कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने अपनी निष्पक्षता और स्वतंत्रता पूरी तरह खो दी थी। वे पूरी तरह विपक्षी मोर्चे के साथ जा मिली थीं और निराशा एवं पराजय की भावना फैलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थीं। बीबीसी और पश्चिमी प्रेस के आने से पहले भी प्रेस हमारे खिलाफ था। पश्चिमी प्रेस हमेशा से हमारे विरोध में रहा है। द गार्जियन जैसे समाचार-पत्र हमेशा यहां यहूदी प्रतिनिधियों को भेजते थे। वे इजरायल के चलते हमसे नाराज थे। 1969 में मुझे बदनाम करने का अभियान चलाया गया, लेकिन हमारा मीडिया खामोश रहा। हमारे अधिकांश समाचार-पत्रों ने इसका कोई विरोध नहीं किया।

किताब में जगजीवन राम से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए भी मीडिया पर सवाल उठाए गए हैं। इसमें लिखा है - यदि हमें कम प्रतिशत वोट मिलते, तो इसका खूब प्रचार किया जाता है। उदाहरण के लिए, गुजरात में हमारी सभाओं में विपक्ष की सभाओं की तुलना में कहीं अधिक लोग आते थे। फिर भी, हमारी सभाओं में व्यवधान उत्पन्न करने की इक्का-दुक्का घटनाओं से हर कोई परेशान हो जाता। हमारे कई नेताओं को चोटें आईं, जिनमें जगजीवन राम भी शामिल थे। हमारे एक उम्मीदवार को एक घर में बंद कर दिया गया, उसे जिंदा जलाने की कोशिश की, वह बाल-बाल बचा। लेकिन इन घटनाओं को कोई खास कवरेज नहीं मिला। क्या प्रेस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का यही अर्थ है?

‘इस्तीफे के लिए दबाव डालना लोकतंत्र नहीं’

इंदिरा गांधी, विपक्षी दलों के चुनावी प्रक्रिया पर सवाल से भी नाराज रहती थीं। वैसे आजकल राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष जब हारता है, तो EVM आदि पर सवाल उठाता ही रहता जाते हैं। ‘इंदिरा गांधी–माय ट्रुथ’ में लिखा है - हमने हमेशा मतदाताओं के फैसले को स्वीकार किया है, लेकिन कुछ विपक्षी दल दोहरे मापदंड अपनाते हैं। हारने पर वे चुनावों में धांधली जैसे आरोप लगाने लगते हैं। सरकार का विरोध किया जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय हित का नहीं। विपक्षी मोर्चे ने इस अंतर को समझने में पूरी तरह नाकामी दिखाई। लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का अर्थ लोकतंत्र को ही कमजोर करने की खुली छूट नहीं है। लोकतंत्र में भी कुछ सीमाएं होती हैं, जिन्हें पार नहीं किया जा सकता। जब वे जीतते हैं, तो व्यवस्था के समर्थक बन जाते हैं। जब हारते हैं, तो उसी व्यवस्था की निंदा करने और उस पर हमला करने लगते हैं। राजनीतिक गतिविधियां संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित की जानी चाहिए। बार-बार तथाकथित अंतिम हथियार यानी सत्याग्रह का सहारा लेना लोकतंत्र नहीं है। इसी तरह, धमकाकर और दबाव डालकर विधिवत निर्वाचित विधायकों से इस्तीफा दिलवाना भी लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहस की आजादी शामिल है। लेकिन क्या लोकतंत्र के नाम पर बिना किसी तथ्यात्मक आधार के किसी के चरित्र हनन का सुनियोजित और तीखा अभियान चलाना उचित है?

indira gandhi my truth

इंदिरा गांधी की इस सोच से इतर कांग्रेस आज देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए अभियान चला रही है और इस मुद्दे पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का समर्थन भी कर रही है। इससे पहले शिक्षा मंत्री रहे धर्मेन्द्र प्राधान के इस्तीफे के लिए भी कांग्रेस ने विरोध-प्रदर्शन के सहारे सरकार पर दबाव बनाया था।

प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी का कार्यकाल

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दो अलग-अलग अवधियों में प्रधानमंत्री पद संभाला था...

विवरणजानकारी
प्रधानमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल24 जनवरी 1966 – 24 मार्च 1977
प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल14 जनवरी 1980 – 31 अक्टूबर 1984
कुल कार्यकाललगभग 15 वर्ष 9 महीने
राजनीतिक दलभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
भारत की पहली महिला प्रधानमंत्रीहां
प्रधानमंत्री पद पर पहली बार नियुक्ति24 जनवरी 1966
प्रधानमंत्री पद से अंतिम बार कार्यकाल समाप्त31 अक्टूबर 1984
निधन31 अक्टूबर 1984

स्रोत: भारत सरकार के प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री संग्रहालय की आधिकारिक वेबसाइटें।

नोट: इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में कुल कार्यकाल लगभग 15 वर्ष 9 महीने था।

Updated on:
21 Oct 2026 04:39 pm
Published on:
21 Oct 2026 04:29 pm
Also Read
View All
जदयू के वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह से मिलने अस्पताल पहुंचे अनंत सिंह, बोले- वे बीमार हैं, मोबाइल से पता चला

‘तिरंगा फहराने के कारण हिरासत में नहीं गए’, सौरव दास-आशुतोष रांका पर संबित पात्रा का बयान

‘विदेश जाकर सरकार गिराने की साजिश रचने वाले देश के दुश्मन’, संबित पात्रा का राहुल गांधी और संजय राउत पर जुबानी हमला

Tiger Shroff firing case Update: टाइगर श्रॉफ फायरिंग केस, तीनों आरोपियों को 31 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजा

‘तिरंगे की आड़ में अराजकता फैलाने की छूट नहीं’, दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद संबित पात्रा ने विपक्ष पर साधा निशाना