
India Space Economy: भारत का स्पेस सेक्टर इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। दशकों तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अकेले ही सैटेलाइट बनाने से लेकर उसके लॉन्चिंग और मिशन से जुड़े हर काम करता आया है, लेकिन बीते पांच से छह सालों में केंद्र सरकार इस मॉडल को बदलने की दिशा में जुटी हुई है। अंतरिक्ष सुधारों को भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 के जरिए इसे संस्थागत रूप दिया गया। उसके बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी उदार बनाने वाली नीति भी लाई गई। इन बदलावों का मकसद एक बड़ा, मजबूत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना है, जिसमें ISRO के साथ-साथ निजी कंपनियां भी बराबर की भागीदार बनें।
हालांकि, ISRO चेयरमैन वी. नारायणन ने बेंगलुरु एस्पो के उद्घाटन के मौके पर कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन एक सरकारी संस्था है। उन्होंने कहा कि देश में अंतरिक्ष क्षेत्र और स्पेस इकोनॉमी को बढ़ाने के लिए ISRO प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप्स के साथ काम कर रहा है। दरअसल, बीते कुछ समय से स्पेस सेक्टर में निजी उद्योगों की बढ़ती भागीदारी को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की थी। कई वैज्ञानिकों को इसरो छोड़कर निजी क्षेत्र में जाने की खबर भी सामने आई थी।
भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने पहली बार अंतरिक्ष क्षेत्र के अलग-अलग खिलाड़ियों की भूमिकाएं तय की। इसके तहत इसरो को अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए परिचालन और उत्पादन से जुड़े काम छोड़कर रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर ध्यान देना होगा। ISRO की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) को मांग-आधारित मोड में रणनीतिक अंतरिक्ष गतिविधियां संभालने का जिम्मा सौंपा गया है, जबकि भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) निजी कंपनियों के लिए सिंगल-विंडो नियामक की भूमिका निभा रहा है, जो उन्हें अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए अधिकृत करने से लेकर ISRO की तकनीकों के हस्तांतरण तक में मदद करता है। इस नीति का मूल लक्ष्य अनुसंधान, शिक्षा, स्टार्टअप और उद्योग की भागीदारी को प्रोत्साहित करके क्षेत्र में समग्र विकास को बढ़ावा देना है।
साल 2023 की नीति में स्पष्ट किया गया है कि जो तकनीकें पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी हैं। जिनका बड़े पैमाने पर नियमित उत्पादन संभव है। उसे प्राइवेट सेक्टर को सौंपा जा सकता है, ताकि इसरो के वैज्ञानिक अपना पूरा ध्यान अत्याधुनिक अनुसंधान और भविष्य के मिशनों पर केंद्रित कर सकें।
वहीं, मोदी सरकार ने कुछ समय पहले स्पेस सेक्टर में बड़े नीतिगत बदलाव के तहत FDI की भी मंजूरी दी है। इसके तहत सैटेलाइट, ग्राउंड सेगमेंट तथा यूजर सेगमेंट के उपकरणों और प्रणालियों-उपप्रणालियों के निर्माण में 100 फीसदी FDI की मंजूरी दी है। इसके अलावा उपग्रह उप-क्षेत्र को अलग-अलग गतिविधियों में बांटकर हर एक के लिए अलग निवेश सीमा तय की गई, जबकि सैटेलाइट से जुड़ी गतिविधियों में स्वचालित मार्ग से 74 प्रतिशत तक विदेशी निवेश को मंजूरी दी गई है।
मोदी सरकार ने नीतिगत सुधार करते हुए तर्क दिया कि स्पेस सेक्टर में उदारीकरण (Liberalization) से विदेशी निवेश आर्कषित होगा। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर आसान होगा और इस सेक्टर में आय व रोजगार में वृद्धि होगा। सरकार द्वारा हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था करीब 9 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम व नीतिगत सुधारों के चलते अगले दशक में इसके 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
FICCI और EY की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र 2024 में लगभग 8.4 अरब डॉलर से बढ़कर 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिससे वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा 2 प्रतिशत से बढ़कर करीब 8 प्रतिशत हो जाएगी। हाल के वर्षों में निजी निवेश की रफ्तार भी तेज हुई है। वित्त वर्ष 2021-2022 में यह निवेश जो 100.5 मिलियन डॉलर था, मार्च 2026 में बढ़कर 618.5 मिलियन डॉलर हो गया।
हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस ने भारत का पहला निजी विकसित रॉकेट प्रक्षेपित करने के बाद जुलाई 2026 में अपने कक्षीय रॉकेट 'विक्रम-1' का श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपण किया, जिसे भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नई शुरुआत माना जा रहा है। IIT-मद्रास से निकली अग्निकुल कॉसमॉस अपने 3D-प्रिंटेड इंजन वाले अग्निबाण रॉकेट पर काम कर रही है और उसने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में अपना पहला लॉन्चपैड भी स्थापित किया है।
बेंगलुरु की पिक्सल हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट बना रही है और अपने प्रक्षेपणों के लिए ISRO के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय लॉन्च विकल्पों का भी इस्तेमाल कर रही है। उद्योग संगठन इंडियन स्पेस एसोसिएशन के आंकड़ों के हिसाब से देश में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है, और हाल की एक रिपोर्ट बताती है कि जुलाई 2026 तक निजी स्पेस-टेक इकोसिस्टम ने 241 फंडिंग राउंड में रिकॉर्ड 871 मिलियन डॉलर जुटाए, जिसमें फिलहाल 274 सक्रिय कंपनियां शामिल हैं।
इस ग्रोथ को संस्थागत सहारा देने के लिए IN-SPACe ने स्पेस स्टार्टअप्स के लिए 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड बनाया है, जिसका मकसद पांच साल में करीब 40 उभरते स्पेस-टेक स्टार्टअप्स को इक्विटी पूंजी के जरिए सहयोग देना है, ताकि वे तकनीक विकास, व्यावसायीकरण और परिचालन विस्तार में आगे बढ़ सकें। इसके अतिरिक्त IN-SPACe ने स्टार्टअप्स और MSMEs की मदद के लिए 500 करोड़ रुपये का 'टेक्नोलॉजी अडॉप्शन फंड' भी शुरू किया है। स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना और NIDHI जैसी योजनाओं के तहत भी अंतरिक्ष क्षेत्र को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में रखा गया है।
निजी क्षेत्र सिर्फ छोटे उपग्रह प्रक्षेपणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम गगनयान में भी उसकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने हाल ही में कहा कि गगनयान अब सिर्फ ISRO का मिशन नहीं रह गया, बल्कि यह पूरे भारत का मिशन बन चुका है, और नीतिगत सुधारों के बाद निजी क्षेत्र व स्टार्टअप्स ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी है। गगनयान का पहला मानवरहित परीक्षण 2026 के अंत तक होने की उम्मीद है, जिसके तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन के लिए भेजने की योजना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत 2035 तक अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) और 2040 तक चांद पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजने का लक्ष्य भी घोषित किया है। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और लार्सन एंड टुब्रो जैसी बड़ी निजी कंपनियां पहले से ही ISRO के साथ मिलकर पूरे प्रक्षेपण यान बनाने के अनुबंध पर काम कर रही हैं, जो दिखाता है कि निजी भागीदारी अब सिर्फ स्टार्टअप स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि बड़े औद्योगिक घरानों तक फैल चुकी है।
हालांकि, इन बदलावों और सुधार के दावों के बीच वैज्ञानिकों की अपनी चिंताएं भी सामने आई हैं। ISRO के हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ कर्मचारी संगठनों ने संगठन के अध्यक्ष वी. नारायणन को पत्र लिखकर पूछा कि क्या विनिर्माण और परिचालन का काम निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है, और इसका मौजूदा स्टाफ व भविष्य की भर्तियों पर क्या असर पड़ेगा। रिपोर्टों के अनुसार कर्मचारी संगठनों की मुख्य चिंता रॉकेट बनाने और लॉन्च करने से जुड़े काम को लेकर है। उनका कहना है कि निजी कंपनियों को इस क्षेत्र में काम करने की इजाजत देना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इससे ISRO की मुख्य भूमिका कमजोर नहीं होनी चाहिए।