
Nana Patekar Ab Tak Chhappan: राजनीति में कुछ शब्द वक्त के साथ महज संबोधन नहीं रहते, बल्कि सत्ता के दावों और जनता की उम्मीदों के बीच टकराव का प्रतीक बन जाते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने अभिनेता नाना पाटेकर की चर्चित फिल्म अब तक छप्पन का जिक्र करते हुए ऐसा ही एक राजनीतिक सवाल उठाया है। उनके बयान में फिल्मी संदर्भ के बहाने पिछले दशक की राजनीतिक सोच पर निशाना साधा गया है, जिसने सोशल मीडिया पर नई बहस की जमीन तैयार की है।
भारतीय राजनीति में फिल्मी किरदारों, संवादों और लोकप्रिय प्रतीकों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। कभी चुनावी मंचों पर फिल्मों के डायलॉग सुनाई देते हैं, तो कभी सोशल मीडिया पर किसी फिल्म का नाम राजनीतिक संदेश देने का जरिया बन जाता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश की ताजा टिप्पणी भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है। उन्होंने अभिनेता नाना पाटेकर की फिल्म ‘अब तक छप्पन’ का हवाला देकर बीते दशक में प्रचलित एक राजनीतिक मानसिकता पर सवाल उठाया है।
जयराम रमेश ने अपने आधिकारिक X अकाउंट पर नाना पाटेकर के व्यक्तित्व और उनके अभिनय की सराहना करते हुए उन्हें मंच तथा सिनेमा, दोनों का प्रभावशाली कलाकार बताया। उन्होंने फिल्म ‘अब तक छप्पन’ का जिक्र किया और कहा कि पिछले दशक में ‘छप्पन’ शब्द ने भारतीय मानसिकता में एक नया अर्थ हासिल कर लिया था। इसके बाद उन्होंने इस सोच को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए सवाल किया कब तक छप्पन?’
यह टिप्पणी केवल फिल्म के नाम तक सीमित नहीं है। इसके जरिए कांग्रेस नेता ने एक ऐसे राजनीतिक प्रतीक पर निशाना साधने की कोशिश की है, जिसका इस्तेमाल सार्वजनिक विमर्श में ताकत और उपलब्धियों के दावों से जोड़कर देखा जाता रहा है।
राजनीतिक संवाद में प्रतीकों की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि वे कम शब्दों में बड़े संदेश देने का काम करते हैं। ‘56 इंच’ का मुहावरा भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी की मजबूत नेतृत्व वाली छवि से जुड़ा रहा है। समर्थकों ने इसे निर्णायक नेतृत्व और मजबूत इच्छाशक्ति के प्रतीक के रूप में पेश किया, जबकि विपक्ष ने समय-समय पर इसी मुहावरे के जरिए सरकार की नीतियों और उसके दावों पर सवाल उठाए।
जयराम रमेश की टिप्पणी को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में समझा जा सकता है। उनका सवाल सत्ता के प्रतीकों और उनके वास्तविक प्रदर्शन के बीच अंतर पर बहस को आगे बढ़ाता है। हालांकि, किसी राजनीतिक दावे का मूल्यांकन केवल शब्दों या नारों से नहीं, बल्कि नीतियों के परिणाम, रोजगार, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और जनकल्याण जैसे ठोस मुद्दों से किया जाना चाहिए।
आज एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राजनीतिक दलों के लिए अपने विरोधियों पर निशाना साधने और समर्थकों तक संदेश पहुंचाने का अहम माध्यम बन चुके हैं। फिल्मी संदर्भ और छोटे, धारदार सवाल पोस्ट को अधिक चर्चा योग्य बना सकते हैं। लेकिन ऐसी टिप्पणियों का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि जनता उन्हें मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से किस तरह जोड़कर देखती है।