जनरल वीपी मलिक जिस दिन आर्मी चीफ बने, उस दिन भी पाकिस्तान की ओर से कारगिल में बड़ा हमला हुआ था। इसके 20 महीने बाद कारगिल युद्ध हुआ। तब भी सेना प्रमुख जनरल मलिक ही थे।
1999 में 3 मई को पाकिस्तान की नापाक साजिश बेनकाब हुई थी, जब कुछ चरवाहों ने कारगिल सेक्टर में बांजु मुख्यालय पर सेना की यूनिट में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा था। उनकी सूचना पर इलाके में तेज गश्त की गई। जमीन और आसमान से निगरानी की गई। तब पता चला कि पाकिस्तान के फौजी कश्मीरी आतंकी बन कर भारतीय सेना की चौकियों में घुसे हुए हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर लड़ाई की तैयारी भी कर रखी थी।
भारतीय सेना सक्रिय हुई और 5 मई से भारत-पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध छिड़ गया। कारगिल युद्ध। भारतीय सेना एक-एक कर पाकिस्तानियों पर फतह हासिल करती गई और अंततः 26 जुलाई को युद्ध का औपचारिक समापन हुआ।
पाकिस्तान ने ऐसी तैयारी की थी कि भारत को इसकी भनक तक नहीं लगी। उल्टा उसने भारतीय खुफिया एजेंसियों को अपने जाल में फंसा लिया था।
कारगिल युद्ध के समय सेना प्रमुख थे जनरल वीपी मलिक। उन्होंने खुफिया एजेंसियों की नाकामी से जुड़ी कुछ बातें अपनी किताब 'कारगिल: फ्रॉम सरप्राइज टु विक्ट्री' में बताई हैं।
जनरल मलिक लिखते हैं कि भारतीय खुफिया एजेंसियों को कारगिल युद्ध शुरू हो जाने तक भी पाकिस्तानी सेना की भारत में सुनियोजित घुसपैठ का सुराग नहीं मिल पाया था। स्कर्दू और कुछ अन्य इलाकों में कुछ आतंकी कैंप होने की खबर जरूर थी। यह जगह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलओसी) से 50-150 किलोमीटर दूर थी। यहां आतंकी कैंप होने की खबर का खुफिया एजेंसियों के पास कोई सबूत नहीं था। उन्होंने बस एक बातचीत इंटरसेप्ट की थी। दरअसल पाकिस्तान ने भारत को धोखे में रखने के लिए इस कैंप की बात कर खुफिया एजेंसियों को जाल में फंसाया था।
जनरल मलिक ने खुफिया एजेंसियों की नाकामी का एक प्रमुख कारण उन दिनों सरकार द्वारा संयुक्त खुफिया समिति (जेआईसी) को महत्व नहीं दिया जाना बताया।
पूर्व सेना प्रमुख मलिक के मुताबिक, अप्रैल 1998 में खुफिया एजेंसी रॉ ने कहा था कि पाकिस्तान के लिए निकट भविष्य में भारत पर हमले की बात सोचना तर्कसंगत नहीं होगा। सितंबर, 1998 में भी रॉ का यही आंकलन था कि पाकिस्तान के पास पैसों की भारी कमी है, उसकी सेना के पास तो और भी ज्यादा आर्थिक दिक्कत है। हालांकि, इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान अपने सहयोगियों की मदद से सीमित हमला कर सकता है और प्रॉक्सी वार के जरिए एलओसी को अशांत बनाए रख सकता है।
यह रिपोर्ट मिलने पर सेना मुख्यालय ने तत्काल यह जानने की कोशिश की थी कि वे इलाके कौन से हो सकते हैं, जिन्हें पाकिस्तान निशाना बना सकता है। तय प्रक्रिया के तहत सेना मुख्यालय की ओर से मासिक आंकलन/फॉलो-अप रिपोर्ट मांगी गई। जेआईसी या रॉ की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं आया।
रॉ ने मार्च 1999 में जो रिपोर्ट दी उसमें भी ऐसी किसी आशंका का जिक्र नहीं था कि पाकिस्तानी सेना आतंकी के रूप में भारत में घुसपैठ कर सकती है। उसमें जिक्र था कि अप्रैल/मई में पाकिस्तान की ओर से भारी गोलाबारी के लिए तैयारी किए जाने के संकेत हैं। साथ ही, यह भी लिखा गया था कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत को देखते हुए निकट भविष्य में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना तर्क संगत नहीं लगता।
पाकिस्तान की ओर से कारगिल पर हमला उस दिन भी हुआ था जब वीपी मलिक सेना प्रमुख बने थे। वह किस्सा कुछ यूं है:
साल 1997। सितंबर महीने की 30 तारीख। जनरल वीपी मलिक और उनकी पत्नी को लगातार बधाइयां मिल रही थीं। इसके दो कारण थे- एक तो दोनों की शादी की 29वीं सालगिरह और दूसरा, जनरल मलिक अगले दिन सेना प्रमुख की कुर्सी संभालने जा रहे थे।
शाम के पांच बजे थे। जनरल मालिक के फोन की घंटी बजी। दूसरी ओर डीजीएमओ (Director General Military Operations) थे। उनके पास एक बुरी खबर थी, जो नए सेनाध्यक्ष को बताने के लिए उन्होंने फोन किया था। कारगिल सेक्टर में भयानक गोलाबारी हुई थी। शहर तबाह हो गया था। कई नागरिकों की जान चली गई थी और संपत्ति का भी भारी नुकसान हुआ था। कई लोग डर के मारे शहर छोड़ कर जा रहे थे।
इस क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी की घटना कोई नई बात नहीं थी, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर करना नई बात थी।
रात दस बजे जनरल मलिक को उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल एस पद्मनाभन का फोन आया। उन्होंने पाकिस्तान की ओर से हुए हमलों की भयावहता बताई और रात खत्म होते ही पाकिस्तान के तोपों को उड़ाने की अपनी योजना भी बताई। जवाबी हमले का पूरा प्लान सुन कर जनरल मलिक ने अपनी हरी झंडी दे दी।
इस बीच रात को ही खबर मिली कि सुबह प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल 10 बजे अपने निवास पर हालात की समीक्षा के लिए बैठक करेंगे। बतौर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) जनरल मलिक का वह पहला ही दिन था। मलिक ने अपनी किताब 'कारगिल: फ्रॉम सरप्राइज टु विक्ट्री' में यह ब्योरा देते हुए लिखा है, 'मुझे मालूम नहीं था कि कारगिल मेरे पेशेवर जीवन में सबसे महत्वपूर्ण प्रकरण बनने वाला है।'