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Supreme Court Collegium System: जजों की नियुक्ति से बेंच बदलने तक: जस्टिस कौल के खुलासों ने क्यों बढ़ाई न्यायपालिका की चिंता?

Modi Government Judiciary Controversy: क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकारी सहमति की भूमिका न्यायिक स्वतंत्रता के लिए चुनौती बन सकती है? पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज के संस्मरण ने ऐसे सवाल खड़े किए हैं, जिन पर राजनीतिक गलियारों से लेकर कानूनी जगत तक बहस तेज हो सकती है।
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Updated: 25 Oct 2026, 12:35 PM IST
Supreme Court Collegium System
Supreme Court Collegium System : जस्टिस कौल की किताब से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस तेज, जयराम रमेश ने उठाए सवाल (फोटो सोर्स: ANI)

Justice Sanjay Kishan Kaul Memoir: लोकतंत्र में न्यायपालिका की ताकत केवल उसके फैसलों में नहीं, बल्कि इस भरोसे में भी होती है कि वह किसी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करती है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश संजय किशन कौल के आने वाले संस्मरण ने इसी भरोसे को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इन खुलासों के आधार पर केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। अब बहस केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायिक संस्थाओं की स्वायत्तता तक पहुंच गई है।

जस्टिस कौल के संस्मरण से गरमाई सियासत, जयराम रमेश ने उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल के संस्मरण Without Fear or Favour में किए गए खुलासों ने न्यायपालिका और केंद्र सरकार के संबंधों को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन घटनाओं से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

रमेश के मुताबिक, न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका, कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले नामों पर सहमति लेने की कोशिश और एक अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवार से जुड़ी जातिगत पूछताछ जैसे प्रसंग चिंताजनक हैं। उन्होंने इस पूरे मामले को लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता से जोड़ते हुए न्यायपालिका को सत्ता के दबाव से मुक्त रखने की जरूरत बताई।

नियुक्तियों से पहले सरकार की राय पर विवाद

द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस कौल ने अपने संस्मरण में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के साथ नियुक्तियों को लेकर मतभेदों का जिक्र किया है। कौल का आरोप है कि कुछ मौकों पर कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले सरकार की सहमति लेने की बात उठी।

उन्होंने परामर्श और पहले से मंजूरी लेने के बीच अंतर पर जोर दिया। उनका मानना है कि यदि नियुक्तियों पर विचार करने से पहले ही सरकार की राय निर्णायक बनने लगे, तो इससे भविष्य में भी ऐसी परंपरा कायम होने का खतरा पैदा हो सकता है।

एक अन्य प्रसंग में कौल ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक न्यायाधीश पद के उम्मीदवार को लेकर सरकार की पूछताछ पर आपत्ति जताई। उनके अनुसार, उम्मीदवार के परिवार की जाति से जुड़ा सवाल अनुचित था। इस मुद्दे पर असहमति इतनी बढ़ी कि उन्होंने एक बैठक छोड़ दी। कौल के मुताबिक, बाद में सरकार ने संबंधित उम्मीदवार की नियुक्ति पर सहमति दे दी।

पीएमएलए मामले में पीठ बदलने का मुद्दा भी उठा

संस्मरण में कौल ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) से जुड़े एक मामले का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, उनकी अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पहले के फैसले के कुछ पहलुओं पर दोबारा विचार किए जाने के प्रश्न को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। बाद में यह मामला दूसरी पीठ के सामने पहुंच गया।

कौल ने इस घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी पीठ के संभावित फैसले को लेकर आशंकाओं के कारण मामलों को दूसरी पीठ में नहीं भेजा जाना चाहिए। हालांकि, यह उनका संस्मरण में दर्ज पक्ष है; इस घटनाक्रम से जुड़े सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

चंद्रचूड़ का जवाब भी अहम

जस्टिस चंद्रचूड़ ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि उन्होंने संस्मरण नहीं पढ़ा है, इसलिए उसके संदर्भों पर विस्तृत प्रतिक्रिया देना मुश्किल है। उन्होंने कॉलेजियम की बैठकों को सौहार्दपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्हें जस्टिस कौल के बैठक छोड़कर जाने की घटना याद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका होती है और नियुक्ति के वारंट पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं।

कॉलेजियम व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

यह विवाद न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था पर भी ध्यान खींचता है। वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखा था। कौल ने अपने संस्मरण में एनजेएसी को एक अवसर दिए जाने की वकालत भी की है। साथ ही, उन्होंने कॉलेजियम की अपारदर्शिता और उसमें सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर चिंताएं जताई हैं।

जयराम रमेश की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। लेकिन व्यापक सवाल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है: न्यायाधीशों की नियुक्ति और मामलों की सुनवाई से जुड़ी प्रक्रियाएं कितनी पारदर्शी हैं और संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?

Updated on:
25 Oct 2026, 12:35 PM IST
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