
Kailash Mansarovar Yatra Flood: कैलाश मानसरोवर की पवित्र यात्रा पूरी कर घर लौट रहे तमिलनाडु के यात्रियों के लिए वापसी का सफर जिंदगी और मौत की जंग बन गया। तिरुप्पुर के योगेश ने उस भयावह मंजर को याद करते हुए ANI X पर बताया कि बाढ़ ने रास्ते, गांव और जरूरी दस्तावेजी व्यवस्थाएं तक तबाह कर दी थीं। हालात इतने बिगड़ गए कि यात्रियों को अपने तय मार्ग से हटकर दूसरे रास्ते से निकालना पड़ा। चीन और नेपाल की मदद से आखिरकार उनका दल भारतीय सीमा तक पहुंच सका।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा श्रद्धा, आस्था और कठिन पहाड़ी सफर का अनोखा संगम मानी जाती है। लेकिन इस बार कई यात्रियों के लिए यह धार्मिक यात्रा एक भयावह आपदा की याद बन गई। नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने उन रास्तों को तबाह कर दिया, जिनसे होकर यात्री भारत लौटने वाले थे।
तिरुप्पुर के रहने वाले योगेश ने बताया कि उनके समूह में 39 लोग थे। सभी ने अपने गांव से यात्रा शुरू की थी। निर्धारित मार्ग के अनुसार दल केरुंग के रास्ते मानसरोवर पहुंचा था। लेकिन वापसी के दौरान हालात अचानक बेकाबू हो गए।
योगेश के मुताबिक, बाढ़ इतनी विनाशकारी थी कि रास्ते में मौजूद सामान बह गया और सीमा से जुड़ी इमिग्रेशन व्यवस्था भी प्रभावित हुई। कई गांवों का अस्तित्व तक मानो मिट गया। ऐसे में यात्रियों के लिए उसी रास्ते से वापस लौटना संभव नहीं रहा।
यात्रियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जिस मार्ग से वे वापस लौटने वाले थे, वही प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ चुका था। रास्ते में पुल, सड़कें और दूसरी बुनियादी सुविधाएं बुरी तरह प्रभावित हुई थीं।
ऐसे समय में चीन की ओर से यात्रियों को वैकल्पिक रास्ते से निकालने में सहायता की गई। योगेश ने बताया कि चीनी अधिकारियों ने यात्रियों को दूसरे मार्ग से आगे बढ़ाया और सीमा तक पहुंचाने में मदद की। उन्होंने चीनी सरकार के सहयोग और एस्कॉर्ट व्यवस्था का विशेष रूप से जिक्र किया।
यह मदद इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि पहाड़ी सीमा क्षेत्र में आपदा के बाद सामान्य आवाजाही लगभग ठप हो गई थी।
चीन की सीमा से निकलने के बाद यात्रियों के सुरक्षित भारत लौटने की जिम्मेदारी में नेपाल की भूमिका सामने आई। योगेश के अनुसार, नेपाल सरकार ने यात्रियों को भारतीय सीमा तक पहुंचाने में सहयोग किया।
इस पूरी प्रक्रिया में तमिलनाडु सरकार और केंद्र सरकार ने भी समन्वय किया। कई स्तरों पर अधिकारियों के बीच संपर्क और बचाव प्रयासों के बाद यात्रियों को धीरे-धीरे सुरक्षित क्षेत्र की ओर लाया गया।
योगेश ने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद अलग-अलग सरकारों और प्रशासन की मदद से उनका दल आखिरकार भारत की ओर लौट सका।
यह आपदा अगस्त के अंतिम सप्ताह में नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार, 26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवागढ़ी और तिमुरे क्षेत्र के आसपास अचानक आई बाढ़ और मलबे के सैलाब ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के लिए यह इलाका बेहद महत्वपूर्ण ट्रांजिट रूट है।
शुरुआती जानकारी में प्राकृतिक आपदा को लेकर अलग-अलग आशंकाएं सामने आई थीं, लेकिन बाद की रिपोर्टों में ग्लेशियर से जुड़ी घटना और बड़े पैमाने पर मलबा बहने को इस तबाही से जोड़ा गया। तेज बहाव ने सड़क, पुल, वाहन, इमारतों और सीमा क्षेत्र की दूसरी सुविधाओं को नुकसान पहुंचाया।
इस त्रासदी में तमिलनाडु और पुडुचेरी से कैलाश मानसरोवर जा रहे कई यात्री भी प्रभावित हुए। एक समूह में कुल 57 यात्रियों के होने की जानकारी सामने आई थी, जिनमें शुरुआती दौर में 20 लोगों के सुरक्षित होने की खबर मिली थी, जबकि बाकी यात्रियों को लेकर चिंता बनी हुई थी।
बाद में 21 तमिलनाडु यात्रियों के सुरक्षित बच निकलने की खबर सामने आई। इन यात्रियों ने बताया कि किस तरह अचानक पानी, कीचड़ और पत्थरों का सैलाब आया और उन्हें वाहन छोड़कर ऊंचाई की ओर भागना पड़ा।
एक अन्य समूह के यात्रियों ने यह भी बताया कि कठिन हालात में साड़ी तक को सहारे के रूप में इस्तेमाल कर लोगों को ऊपर खींचा गया। इस घटना ने आपदा के बीच यात्रियों की सूझबूझ और हिम्मत की तस्वीर भी सामने रखी।
इस हादसे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाढ़ ने केवल सड़क संपर्क को ही नहीं तोड़ा, बल्कि सीमा क्षेत्र की जरूरी व्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाया। रिपोर्टों में रसुवागढ़ी के आसपास सीमा और इमिग्रेशन सुविधाओं के बुरी तरह प्रभावित होने की बात सामने आई है।
यही वजह थी कि यात्रियों की वापसी सामान्य यात्रा की तरह नहीं हो सकी। हर कदम पर प्रशासनिक अनुमति, सुरक्षित रास्ते और परिवहन व्यवस्था की जरूरत पड़ रही थी।
कैलाश मानसरोवर यात्रा दुनिया की कठिन धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। ऊंचाई, दुर्गम पहाड़ और बदलता मौसम पहले से ही यात्रियों के लिए चुनौती होते हैं। लेकिन इस बार प्राकृतिक आपदा ने उस चुनौती को कई गुना बढ़ा दिया।
योगेश की कहानी इस बात की गवाही देती है कि संकट के समय सीमा और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े अलग-अलग देशों के सहयोग का कितना महत्व होता है। एक ओर चीन ने प्रभावित क्षेत्र से यात्रियों को निकालने में सहायता की, वहीं नेपाल ने उन्हें भारतीय सीमा की ओर बढ़ाने में सहयोग किया। भारत और तमिलनाडु सरकार की समन्वय भूमिका ने इस कठिन वापसी को पूरा करने में मदद की।
इस हादसे ने एक बार फिर दिखा दिया कि पहाड़ों में तीर्थयात्रा केवल आस्था का सफर नहीं, बल्कि प्रकृति के अचानक बदलते मिजाज के सामने बेहद सतर्क रहने की परीक्षा भी है।