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मस्तिष्क और पेट के संकेतों से निकाला डिप्रेशन के जल्द उपचार का रास्ता

मस्तिष्क और पेट के संकेतों से डिप्रेशन के जल्द उपचार का रास्ता निकल गया। कहाँ शुरू हुई यह खोज? आइए नज़र डालते हैं।
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Human brain

मस्तिष्क (Representational Photo)

भारत (India) में 4करीब .5% आबादी डिप्रेशन (Depression) से पीड़ित है जो एक बड़ी मानसिक बीमारी है। लेकिन इसका उपचार करने के लिए मनोचिकित्सकों में यह पता लगाने में लंबा समय लगता है कि रोगी को दी जा रही एंटीडिप्रेसेंट दवा उस पर असर कर रही है या नहीं। लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर (आईआईटी) और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा तरीका खोजा है, जिससे सिर्फ 7 से 10 दिनों के भीतर कौन सी दवा उपचार में असर करेगी, इसका पता लग जाएगा। इसके लिए मस्तिष्क और पेट की विद्युत गतिविधियों के संकेतों के साथ मरीज के लक्षणों की जानकारी को मिलाया जाएगा। अभी आमतौर पर दवा के असर का आकलन करने में 4 से 6 सप्ताह लगते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार डिप्रेशन दुनिया भर में अनुमानित 5% वयस्कों को प्रभावित करता है। भारत में यह आंकड़ा लगभग 4.5% है।

व्यक्तिगत इलाज भी संभव

अध्ययन में कुल 206 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इनमें 144 ऐसे मरीज थे, जिन्होंने अध्ययन शुरू होने से पहले डिप्रेशन का इलाज नहीं लिया था। वैज्ञानिकों ने मरीजों के इलाज शुरू होने के समय उनके पेट और मस्तिष्क के संकेत रिकॉर्ड किए। इसके लिए ईईजी और ईजीजी जांच की गई। लगभग एक सप्ताह बाद इन्हें फिर रिकॉर्ड किया गया। फिर इन संकेतों और रोगियों की चिकित्सकीय जानकारी का विश्लेषण किया गया। मस्तिष्क और पेट की अलग-अलग जैविक गतिविधियों के कारण मरीजों में अलग लक्षण पाए गए। इन लक्षणों से व्यक्तिगत उपचार जल्द शुरू करने में मदद मिली और लोगों को फायदा मिला।

मॉडल का रिकॉर्ड रहा खास

यह मॉडल शुरुआती जांच में दवा का पर्याप्त असर न पाने वाले मरीजों में से करीब 84% मरीजों को सही ढंग से पहचान सका। वहीं लाभ लेने वाले 78% मरीजों को भी सही पहचाना। मॉडल को पहले से अलग मरीजों के एक दूसरे समूह पर आजमाया गया। इसमें कुल सटीकता 77.3% रही। नए मरीजों के इस समूह में, असर न पाने वाले मरीजों में 71% मरीजों की सही पहचान की। वहीं, जिन मरीजों पर दवा पर्याप्त असर कर रही थी, उनमें से करीब 80% मरीज को मॉडल ने सही ढंग से प्रतिक्रियाशील मरीज माना।