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Kalighat Kali Temple: कोलकाता के कालीघाट में विराजीं हैं मां काली, देवी सती के दाहिने पैर की चार अंगुलियां गिरने की मान्यता

Navratri Kalighat Temple: कोलकाता के इस प्राचीन शक्तिपीठ पर शारदीय नवरात्र के दौरान हजारों भक्त पहुंच रहे हैं। मां की विशिष्ट प्रतिमा और शक्ति की अनुभूति श्रद्धालुओं को विशेष आकर्षित कर रही है। जानें क्यों यह स्थल बंगाल की धार्मिक पहचान का अटूट हिस्सा बन चुका है।
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Kalighat Kali Temple,
Kalighat Kali Temple: Kalighat Shakti Peeth: नवरात्र में कालीघाट मंदिर बना भक्ति का केंद्र (फोटो सोर्स:@iAkankshaP)

Kalighat Shakti Peeth: शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में पश्चिम बंगाल की राजधानी का एक कोना पूरी तरह भक्तिमय हो उठा है। कालीघाट स्थित मां काली का मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार दिख रहा है। आदि गंगा के किनारे बसा यह स्थान न सिर्फ स्थानीय लोगों बल्कि देश-विदेश से आए भक्तों को अपनी ओर खींच रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां देवी सती के दाहिने पैर की अंगुलियां गिरी थीं, जिसने इसे 51 शक्तिपीठों में प्रमुख स्थान दिलाया। मंदिर परिसर में गूंजते जयकारे और आरती की ध्वनि वातावरण को और पवित्र बना रही है। मां से सुख-समृद्धि और संकट निवारण की कामना लेकर लोग कतार में खड़े हैं।

Kalighat Shakti Peeth: देश के प्रमुख 51 शक्तिपीठों में शामिल कालीघाट मंदिर

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के कालीघाट में विराजीं मां काली का मंदिर देश के प्रमुख 51 शक्तिपीठों में शामिल है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां देवी सती के दाहिने पैर की चार अंगुलियां गिरी थीं। इसी वजह से यह स्थान शक्ति उपासना के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित है। शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

Kolkata Kali Mandir: मां काली की विशिष्ट प्रतिमा और भक्ति का माहौल

मां काली के जयकारों और भक्ति भाव से मंदिर परिसर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। आदि गंगा के तट पर स्थित यह मंदिर बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां विराजमान मां काली की प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है। देवी की लंबी लाल जिह्वा और स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। भक्त मां के दर्शन कर सुख, समृद्धि, आरोग्य और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।

तीन शताब्दियों से जुड़ी धार्मिक परंपरा

कालीघाट मंदिर का धार्मिक महत्व प्राचीन माना जाता है, जबकि इसकी वर्तमान वास्तुकला 19वीं शताब्दी से जुड़ी है। मंदिर के निर्माण और विकास में सावर्णी राय चौधरी परिवार तथा अन्य स्थानीय जमींदारों की भूमिका मानी जाती है। समय के साथ यह मंदिर बंगाल में मां काली की उपासना के सबसे प्रतिष्ठित स्थलों में शामिल हो गया। यहां देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

Navratri Kalighat Temple: नवरात्र में मां काली की आराधना का विशेष महत्व

नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा के साथ मां काली की आराधना भी विशेष फलदायी मानी जाती है। मां काली शक्ति, साहस और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक हैं। कालीघाट मंदिर में भक्त मां को पुष्प, मिठाई और पूजा सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान मां काली की उपासना की परंपरा भी गहरी है। पर्व के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और आरती होती है। श्रद्धालु मां से संकटों से रक्षा और जीवन में सुख-शांति का आशीर्वाद मांगते हैं।

देश के कोने-कोने से और विदेशों से आने वाले श्रद्धालु यहां की ऊर्जा का अनुभव करते हैं। काली पूजा, अमावस्या और बंगाली नववर्ष जैसे अवसरों पर भीड़ और बढ़ जाती है। मंदिर प्रशासन की ओर से व्यवस्था सुचारू रखने के प्रयास जारी हैं। भक्तों का कहना है कि मां के दर्शन मात्र से मन को अपार शांति मिलती है।यह स्थल बंगाल की आस्था का जीवंत प्रतीक है। नवरात्र के इन दिनों में कालीघाट सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति और भक्ति का संगम बन गया है। एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दिनों में भी श्रद्धालुओं का आना-जाना जारी रहेगा।

Updated on:
15 Oct 2026 07:40 am
Published on:
15 Oct 2026 07:40 am