
Madras High Court Divorce Verdict: क्या शादी का मतलब यह है कि पति-पत्नी को नौकरी और परिस्थितियों की परवाह किए बिना हर वक्त साथ ही रहना होगा? मद्रास हाई कोर्ट ने एक पुराने वैवाहिक विवाद में इस सवाल पर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने साफ किया कि रोजगार की मजबूरी में पति का दूसरे शहर जाना अपने आप में वैवाहिक कर्तव्य से मुंह मोड़ना नहीं माना जा सकता। इसी मामले में कोर्ट ने वर्षों से अलग रह रहे दंपती के रिश्ते को भी ऐसी स्थिति में पाया, जहां उसे बचाना संभव नहीं था।
मामला 1992 में विवाह करने वाले एक दंपती से जुड़ा था। दोनों के चार बच्चे हैं। पति नौकरी के सिलसिले में शिवगंगा से मुंबई चला गया था, जबकि पत्नी उसके साथ नहीं गई। बाद में पति ने पत्नी पर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ संबंध होने का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की।
शिवगंगा फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी थी। उसका मानना था कि पति का पत्नी को अपने साथ नहीं रखना वैवाहिक जिम्मेदारी से जुड़ी गंभीर चूक है। इसी आधार पर अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) का हवाला देते हुए कहा था कि पति अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकता।
मद्रास हाई कोर्ट की जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की पीठ ने इस सोच को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने बेहद दिलचस्प उदाहरण देते हुए कहा कि नौकरी की परिस्थितियां हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती हैं। सैनिक का उदाहरण देते हुए पीठ ने कहा कि कोई जवान अपनी पत्नी के लिए हर पोस्टिंग पर अलग पारिवारिक घर नहीं बना सकता।
अदालत ने लोकप्रिय वोडाफोन विज्ञापन में नजर आने वाले पग का जिक्र करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पति के पीछे हर जगह चलती रहे। पत्नी का अपना रोजगार और स्वतंत्र पेशेवर जीवन भी हो सकता है।
हालांकि हाई कोर्ट ने पति के आरोपों को पूरी तरह सही नहीं माना। पीठ ने कहा कि जिस व्यक्ति को कथित प्रेमी बताया गया, उसे मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया था। अदालत ने अपने पुराने फैसले का हवाला देते हुए इसे महत्वपूर्ण कमी माना।
लेकिन सुनवाई के दौरान एक दूसरी तस्वीर सामने आई। पति-पत्नी करीब 16 वर्षों से अलग रह रहे थे और पत्नी की ओर से पति के पास लौटने की कोई औपचारिक कोशिश भी सामने नहीं आई। समझौते की संभावना तलाशने के लिए अदालत ने दोनों पक्षों से बातचीत की, मगर बात नहीं बन सकी।
हाई कोर्ट ने माना कि रिश्ते में गहरी दरार पड़ चुकी है और दोबारा साथ आने की वास्तविक संभावना नहीं बची। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि लंबे समय तक अलग रहना, वैवाहिक जीवन का खत्म हो जाना और रिश्ते का पूरी तरह टूट जाना परिस्थितियों के आधार पर मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है।
अदालत ने अंततः विवाह समाप्त करने का आदेश दिया। हालांकि पति को पत्नी के लिए 7 लाख रुपये गुजारा भत्ता जमा कराने का निर्देश दिया गया। रकम फैमिली कोर्ट में जमा होने के बाद ही तलाक का आदेश प्रभावी होगा।