
Madras High Court: चुनाव प्रचार के दौरान कई बार बच्चे नेताओं की रैलियों में देखे जा सकते हैं। नेताओं के लिए अपने माता-पिता को वोट मांगने की अपील करते हुए भी देखे जा सकते हैं। तो क्या इस आधार पर चुनाव रद्द किया जा सकता है? तमिलनाडु विधानसभा चुनावों को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि राजनीतिक दल के चुनाव अभियानों के लिए बच्चों का इस्तेमाल करना गलत है। लेकिन यह चुनाव को रद्द करने का आधार नहीं है।
अदालत ने यह टिप्पणी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में सेलम नॉर्थ सीट से अभिनेता और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के उम्मीदवार शिवकुमार की जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका पर दी। इस सीट पर शिवकुमार ने डीएमके (DMK) के आर राजेंद्रन को हराया था। यह याचिका डीएमके उम्मीदवार आर राजेंद्रन द्वारा दायर की गई थी, जो शिवकुमार से 14,034 वोटों से चुनाव हार गए थे।
राजेंद्रन का तर्क था कि शिवकुमार का चुनाव अनुचित प्रभाव से प्रभावित था। उन्होंने दावा किया कि टीवीके ने चुनाव संबंधी गतिविधियों में बच्चों की भागीदारी पर रोक लगाने वाले चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया। उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा 21 अप्रैल, 2026 को दिए गए एक भाषण का भी हवाला दिया। जिसमें विजय ने कथित तौर पर बच्चों से अपील की थी वे अपने माता-पिता को टीवीके पार्टी को वोट देने के लिए मनाएं।
याचिका में सोशल मीडिया के कई ऐसे वीडियो का भी हवाला दिया गया था, जिनमें बच्चों को टीवीके के लिए वोट हासिल करने के लिए अपने परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाते या धमकाते हुए दिखाया गया था। इनमें कथित तौर पर बच्चे अपने माता-पिता को अलग-अलग तरीकों से धमकाते या मनाते दिखे। राजेंद्रन ने तर्क दिया कि इस तरह के तरीके अस्वीकार्य थे और यह चुनाव को रद्द करने का आधार हैं।
इस मामले में जस्टिस डी भरत चक्रवर्ती ने कहा कि चुनाव अभियानों के लिए बच्चों का इस्तेमाल करना गलत है। लेकिन ऐसा करना अपने आप में किसी चुनाव को रद्द करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस कृत्य को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपी एक्ट) के तहत अपने आप अनुचित प्रभाव (अंड्यू इन्फ्लुएंस) नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया रील्स के जरिए माता-पिता के वोटिंग विकल्पों को प्रभावित करने के लिए बच्चों के इस्तेमाल की आलोचना की।
बच्चों के जरिए माता-पिता पर किसी विशेष पार्टी को वोट डालने का दबाव बनाना अनुचित है। ऐसे में अदालत ने आगे कहा कि यह संसद में कानून बनाने वालों पर निर्भर है कि वे कानून के जरिए यह तय करें कि ऐसे तरीकों पर रोक लगाई जानी चाहिए या इसे चुनाव रद्द करने का आधार बनाया जाना चाहिए।