
Mahatma Gandhi Grandson Virginia Land Case: अमेरिका में महात्मा गांधी के परिवार की संपत्ति को लेकर चली करीब 20 महीने की कानूनी लड़ाई में भारतीय पक्ष को बड़ी जीत मिली है। वर्जीनिया स्थित 30 एकड़ जमीन पर अपना अधिकार जताने वाले एक अमेरिकी नागरिक का दावा अदालत में टिक नहीं पाया। गुजरात के सूरत से इस मामले की पैरवी कर रहे परिमल देसाई ने दस्तावेजों, भौगोलिक मानचित्रों और कानूनी तथ्यों के सहारे जमीन को ट्रस्ट के अधिकार में सुरक्षित रखने में सफलता हासिल की।
महात्मा गांधी के पोते कनु गांधी और उनकी पत्नी शिवा गांधी की अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में स्थित 30 एकड़ जमीन को लेकर विवाद का अदालत ने निपटारा कर दिया है। वॉरेन काउंटी सर्किट कोर्ट के न्यायाधीश डैरिल एल. फंक ने 21 अक्टूबर को सुनाए फैसले में जमीन पर अपना अधिकार जताने वाले ग्रेगरी ब्लैक के खिलाफ आदेश जारी किया। अदालत ने उसे 30 दिनों के भीतर कब्जा छोड़ने और अपने खर्च पर वहां मौजूद निर्माण व सामान हटाने को कहा है।
यह संपत्ति शेनानडोआ नेशनल पार्क के पास स्थित है। कनु गांधी और शिवा गांधी ने वर्ष 1987 में इसे खरीदा था। जीवन के अंतिम वर्षों में दोनों दक्षिण गुजरात लौट आए थे। कनु गांधी का नवंबर 2016 में सूरत में निधन हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार संपत्ति शिवा गांधी को मिली। वर्ष 2018 में शिवा गांधी ने कनु और अपने नाम से एक धर्मार्थ ट्रस्ट स्थापित किया। 2020 में उनके निधन के बाद वसीयत के तहत संपत्तियों की जिम्मेदारी ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी परिमल देसाई ने संभाली।
देसाई के मुताबिक, 10 जनवरी 2025 को ग्रेगरी ब्लैक ने उनके सूरत स्थित आवास पर कानूनी नोटिस भेजकर जमीन पर अपना दावा जताया। ब्लैक का तर्क था कि वह 2008 से इस संपत्ति का इस्तेमाल कर रहा है। उसने केबिन, शिकार के लिए बने ढांचे, रास्तों और अन्य निर्माणों को अपने दावे के समर्थन में पेश किया।
वर्जीनिया के कानून में कुछ निर्धारित शर्तें पूरी होने पर 15 साल के लगातार प्रतिकूल कब्जे के आधार पर संपत्ति के अधिकार का दावा किया जा सकता है। हालांकि, अदालत में ब्लैक जमीन पर वास्तविक और विशिष्ट कब्जे तथा प्रतिकूल दावे से जुड़ी जरूरी शर्तें साबित नहीं कर सका।
देसाई ने 2024 में जमीन का दौरा कर करीब 4,500 डॉलर खर्च करके उसका सर्वे कराया था। इसके बाद 2025 में अमेरिकी अदालत से वसीयत को वैधानिक मान्यता दिलाकर जमीन का स्वामित्व ट्रस्ट के नाम दर्ज कराया गया। मुकदमे की सुनवाई 8 से 11 सितंबर तक हुई। ट्रस्ट की ओर से पेश GIS मानचित्रों से केबिन के 15 साल पुराने होने के दावे पर सवाल खड़े हुए। जमीन पर दूसरी महिला के रहने की जानकारी भी ब्लैक के एकाधिकार वाले दावे के विरुद्ध गई।
देसाई ने बताया कि उन्होंने अमेरिकी वकीलों की मदद लेने के साथ कानूनी रणनीति तैयार करने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का भी सहारा लिया।
अदालत ने ब्लैक को केबिन, शिकार के लिए बने स्टैंड, झोपड़ियां और निजी सामान 30 दिनों के भीतर हटाने का निर्देश दिया है। उसे जमीन का कब्जा सौंपने और भविष्य में बिना अधिकार वहां प्रवेश करने या स्वामित्व जताने से भी रोक दिया गया है। इसके अतिरिक्त, अज्ञात उत्तराधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले Guardian ad Litem की फीस के रूप में 11,375 डॉलर चुकाने का आदेश दिया गया है।