डॉ. सौम्या गुर्जर: नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में महिलाओं की निर्णय-निर्माण में भागीदारी बढ़ाएगा और लोकतंत्र को अधिक संतुलित बनाएगा।
भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी कभी शून्य नहीं रही, लेकिन यह लंबे समय तक निर्णायक भी नहीं बन पाई। प्रतिनिधित्व था, पर प्रभाव सीमित रहा और यही वह अंतर था, जिसने नीति-निर्माण को अधूरा रखा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी कमी को दूर करने का एक ठोस और आवश्यक प्रयास है।
महिला आरक्षण का प्रश्न नया नहीं है। 1996 से यह विषय देश की राजनीति में मौजूद रहा, लेकिन दशकों तक यह सहमति और प्राथमिकता के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाया। वर्ष 2023 में इसे संवैधानिक स्वरूप मिला, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया। यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे में एक संरचनात्मक सुधार है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस अधिनियम को जिस प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया गया, वह यह स्पष्ट करता है कि महिला सशक्तिकरण अब नीति का केंद्र है, न कि केवल एक सामाजिक विमर्श। “महिला-नेतृत्व वाले विकास” की अवधारणा इसी सोच का विस्तार है।
भारत में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लंबे समय तक सीमित रहा लोकसभा में लगभग 15% और कई विधानसभाओं में इससे भी कम। यह असंतुलन केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं था; इसने नीति-निर्माण की दिशा को भी प्रभावित किया। जब निर्णय-प्रक्रिया में विविधता सीमित होती है, तो नीतियां भी सीमित दृष्टिकोण के साथ बनती हैं।
वैश्विक अनुभव भी यही दर्शाता है कि जहाँ निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वहाँ शासन अधिक संतुलित और संवेदनशील होता है। कई यूरोपीय देशों में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि उनकी कम जनसंख्या उनके विकास का मुख्य कारण है यह आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन पूर्ण सत्य नहीं। वास्तविक अंतर इस बात से आता है कि निर्णय लेने वालों की सोच कितनी समावेशी है।
हमारे समाज में यह अनुभव रहा है कि घर की धुरी महिला होती है। वह केवल जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करती, बल्कि संतुलन और दूरदर्शिता के साथ निर्णयों को दिशा देती है। परिवार के स्तर पर जो नेतृत्व स्वाभाविक रूप से विकसित होता है, वही जब शासन में स्थान पाता है, तो नीतियां अधिक संवेदनशील और समाज के वास्तविक सरोकारों से जुड़ी होती हैं।
इस अधिनियम का महत्व केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक प्रभाव निर्णय-निर्माण की प्रकृति में बदलाव के रूप में दिखाई देगा। जब महिलाएं नीति-निर्माण का हिस्सा बनेंगी, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और बालिकाओं से जुड़े मुद्दे अधिक प्राथमिकता के साथ सामने आएंगे।
भारत में पंचायत स्तर पर महिलाओं के आरक्षण ने पहले ही यह सिद्ध किया है कि अवसर मिलने पर नेतृत्व उभरता है और शासन अधिक उत्तरदायी बनता है। यही अनुभव अब राष्ट्रीय स्तर पर लागू होने जा रहा है, जहाँ महिलाओं की भागीदारी केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि प्रभाव के रूप में दिखाई देगी।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम का वास्तविक महत्व आने वाले वर्षों में सामने आएगा, जब यह भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया को अधिक संतुलित और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाएगा। यह केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि नेतृत्व के पुनर्संतुलन की शुरुआत है।
जब निर्णय-निर्माण में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित होगी, तब शासन अधिक संतुलित, संवेदनशील और भविष्य उन्मुख बनेगा और यही किसी भी विकसित राष्ट्र की वास्तविक पहचान है।