Nitish Kumar in Modi 3.0: नीतीश ने भाजपा से उन कुछ सीटों को भी हासिल किया, जिन पर पहले भाजपा लड़ी थी और जीती भी थी। मतदाताओं ने बिहार में जात-पात को एकदम से नकार दिया है और अब वे विकास और देश का भला किस में है, इस पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। यह मेरे पन्द्रह साल पहले के देखे बिहार से एकदम उलट था। पढ़िए राजेश शर्मा की विशेष रिपोर्ट...
Nitish Kumar in Modi 3.0: बिहार का चुनावी माहौल जानने के दौरान इस बार पता लगा कि वहां पर एनडीए के खिलाफ दल कोई भी हो, प्रत्याशियों की सोशल इंजीनियरिंग की बिसात पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिछाई तो बार-बार बदलने के कारण पलटू चाचा का खिताब पा चुके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिना कोई प्रतिक्रिया जताए शांति के साथ लालू की शतरंजी चालों का जवाब देने की तैयारी करते रहे। नीतीश का एनडीए के साथ जाने का कदम पूरी पार्टी को बचा गया। नीतीश ने भाजपा से उन कुछ सीटों को भी हासिल किया, जिन पर पहले भाजपा लड़ी थी और जीती भी थी। मतदाताओं ने बिहार में जात-पात को एकदम से नकार दिया है और अब वे विकास और देश का भला किस में है, इस पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। यह मेरे पन्द्रह साल पहले के देखे बिहार से एकदम उलट था।
पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र से लेकर चंपारण तक महिलाओं और युवाओं के बीच राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव के प्रति नापसंदगी जगजाहिर थी। खासतौर से बिहार के मतदाता बिहार के उस पुराने दौर को याद भी नहीं करना चाहते, जब अपराधियों, गिरोहों और निजी जातीय सेनाओं का बोलबाला था। आज सुरक्षा, विकास और रोजगार के अवसर बिहार में ही जुटाने की बात हो रही है।
बिहार के मतदाता जानते हैं कि नीतीश कुमार जनता दल यूनाइटेड को बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के साथ गए हैं। जदयू को नीतीश कुमार के इस कदम का फायदा भी मिलता दिख रहा था। आरंभ में भाजपा के कार्यकर्ता जदयू के प्रत्याशियों के पक्ष में काम नहीं कर रहे थे। गृहमंत्री अमित शाह ने दो बार बिहार में रात्रि विश्राम कर कार्यकर्ताओं को कड़ा संदेश दिया कि मोदी सरकार को लाना है तो जदयू के प्रत्याशियों को जिताना होगा।
पांचवें चरण से भाजपा कार्यकर्ताओं ने जदयू के लिए जुटना आरंभ किया लेकिन जदयू वाले भाजपा के पक्ष में उतने नहीं लगे। लोजपा के चिराग पासवान से तो जदयू ने दूरी ही बनाए रखी। बिहार के मतदाता बातचीत में कह रहे थे कि नीतीश कुमार के बार-बार कभी एनडीए में तो कभी ‘इंडिया’ में जाने से छवि खराब हो रही है। अब इन्हें नहीं बदलना चाहिए अन्यथा अन्य दलों का इन पर से विश्वास उठ जाएगा।
लालू प्रसाद यादव का पूरा परिवार अन्य सीटों को छोडक़र अपनी दोनों बेटियों को जिताने के लिए प्राणप्रण से जुटा रहा। पटना के मतदाता कह रहे थे कि इस बार तो मीसा और रोहिणी के लिए लालू और राबड़ी घर-घर जा रहे हैं। मीसा दो बार पहले भी हार चुकी थीं। यादव ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों में भी खासतौर से महिलाओं में मीसा के प्रति सहानुभूति थी, लेकिन लोग तंज कसते थे कि ‘लालू ने विधानसभा में बेटों को सैट कर दिया और बेटियों को लोकसभा भेजना चाहते हैं। राजद का बाकी कार्यकर्ता क्या दरी बिछाने के लिए ही है क्या?’ लालू को लेकर एक बात बिहार में तेजी से फैल रही है कि लालू लोकसभा के लिए नहीं बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की योजना को लेकर काम कर रहे हैं।