
Nepal Flood Glacier Collapse: नेपाल में बाढ़ ने भयंकर तबाई मचाई है। इस आपदा में 900 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और हजारों लोग लापता है। दरअसल, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर और चट्टानों के ढहने से यह बाढ़ आने का कारण बताया जा रहा है। लेकिन अब इस बाढ़ ने पूर्वी हिमालय में आपदाओं के बढ़ते खतरे की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है।
विशेषज्ञों ने कहा कि इस क्षेत्र में खतरा केवल किसी एक प्राकृतिक आपदा तक सीमित नहीं है। एक भूकंप भूस्खलन को जन्म दे सकता है, इसके बाद नदी का रास्ता रूक सकता है और बाद में यही अस्थायी झील टूटकर अचानक बाढ़ का रूप ले सकती है।
न्यूज-18 ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर ल्हेंडे खोला नदी में जा गिरा। इसके बाद तेज गति से पानी और मलबा घाटियों और बस्तियों की ओर बढ़ा।
शुरुआत में इस घटना को भूकंप बताया गया था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के विश्लेषण के बाद सामने आया कि भूकंप जैसी दर्ज हुई हलचल वास्तव में ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ के ढहने से पैदा हुई थी। वैज्ञानिक अभी यह पता लगाने में जुटे हैं कि आखिर किस क्रम में पहाड़ी ढलान अस्थिर हुई और यह घटना इतनी तेजी से कैसे घटी।
दार्जिलिंग में सिक्किम की तरह बड़े और ऊंचाई वाले ग्लेशियल लेक नहीं हैं। इसके बावजूद नेपाल की यह घटना दार्जिलिंग के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरा क्षेत्र उसी भूगर्भीय रूप से सक्रिय हिमालयी प्रणाली का हिस्सा है।
दार्जिलिंग की भौगोलिक स्थिति इसे कई तरह के प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती है। यहां पहाड़ियां बेहद ढलानदार हैं, मानसून में भारी बारिश होती है और भूस्खलन का खतरा बना रहता है। इसके अलावा क्षेत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील है और ऊपरी हिमालय से आने वाली नदियां निचले इलाकों को प्रभावित कर सकती हैं।
दरअसल, दार्जिलिंग में पहले भी भारी बारिश का खतरा दिख चुका है। अक्टूबर 2025 में दार्जिलिंग जिले के कुछ हिस्सों में करीब 12 घंटे के दौरान 300 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश दर्ज की गई थी। इससे कई जगह भूस्खलन और बड़े मलबे के बहाव की घटनाएं हुईं।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के राष्ट्रीय लैंडस्लाइड फोरकास्टिंग सेंटर के आंकड़ों के मुताबिक, इस बारिश से प्रभावित क्षेत्र में बड़ी तबाही हुई। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) और ISRO के आकलन में 24 लोगों की मौत दर्ज की गई थी।
दार्जिलिंग सीस्मिक जोन IV में आता है, जिसे भारत की भूकंपीय जोनिंग व्यवस्था में उच्च क्षति-जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है।जिले की आपदा प्रबंधन योजना में भी भूकंप और भूस्खलन को प्रमुख प्राकृतिक खतरों में शामिल किया गया है। मानसून के दौरान पहाड़ी इलाकों में बार-बार भूस्खलन की घटनाएं सामने आती रही हैं।
ऐसे में किसी बड़े भूकंप की स्थिति में खतरा केवल जमीन के हिलने तक सीमित नहीं रहेगा। भूकंप से ढलान अस्थिर हो सकती है, चट्टानें गिर सकती हैं, भूस्खलन हो सकता है और नदियों का रास्ता मलबे से बंद हो सकता है।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा बंगाल से भी दूर नहीं है। रिपोर्ट में लिखा कि विभिन्न मॉडलिंग अध्ययनों में संकेत मिला है कि संभावित GLOF की स्थिति में 10 हजार से ज्यादा लोग, करीब 1,900 बस्तियां, पांच पुल और दो हाइड्रोपावर परियोजनाएं सीधे प्रभावित हो सकती हैं।
अक्टूबर 2023 में दक्षिण ल्होनक झील (South Lhonak Lake) के फटने की घटना इसका बड़ा उदाहरण है। उत्तरी सिक्किम में ग्लेशियल झील से निकली पानी की तेज लहर ने तीस्ता नदी तंत्र में भारी तबाही मचाई थी।