
Moon Shrinking: एक ओर नासा के आर्टेमिस जैसे आगामी अंतरिक्ष अभियानों के जरिए चांद पर मानव बेस बनाने की योजनाएं तैयार की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों के सामने चंद्रमा को लेकर एक नई चुनौती सामने आई है। एक नए अध्ययन के अनुसार, पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह लगातार सिकुड़ रहा है। पिछले 40 करोड़ वर्षों में चांद की त्रिज्या लगभग 148 फीट यानी 45 मीटर कम हो चुकी है। चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से के ठंडा होने को इस बदलाव का प्रमुख कारण माना गया है।
'द प्लैनेटरी साइंस जर्नल' में प्रकाशित यह अध्ययन चंद्रमा की बदलती संरचना और उसकी सतह पर होने वाली गतिविधियों को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी देता है। स्मिथसोनियन के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम के वैज्ञानिक थॉमस आर. वाटर्स के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में लूनर रीकॉनेसेंस ऑर्बिटर कैमरा के 17 वर्षों के आंकड़ों और लाखों तस्वीरों का विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, चंद्रमा के आंतरिक हिस्से में धीरे-धीरे ठंडक बढ़ने के कारण उसका आकार घट रहा है। मौजूदा रफ्तार के आधार पर चांद हर दस लाख साल में लगभग 6 से 11 सेंटीमीटर सिकुड़ रहा है। यह प्रक्रिया लंबे समय से जारी है और इसके कारण चंद्रमा की सतह पर भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। हालांकि, चंद्रमा के सिकुड़ने का मतलब यह नहीं है कि वह भविष्य में पूरी तरह गायब हो जाएगा। यह उसके आंतरिक तापमान और भूगर्भीय गतिविधियों से जुड़ी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
चंद्रमा के सिकुड़ने के कारण उसकी सतह पर दरारें और अन्य भूगर्भीय बदलाव हो रहे हैं। इस प्रक्रिया से जुड़े प्रभावों में मूनक्वेक यानी चंद्रमा पर आने वाले भूकंप भी शामिल हैं। पृथ्वी पर आने वाले भूकंपों से अलग, चंद्रमा के ये झटके काफी शक्तिशाली हो सकते हैं और कई घंटों तक रुक-रुककर जारी रह सकते हैं।
इन झटकों के कारण चंद्रमा की सतह पर भूस्खलन होने का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में भविष्य में चांद पर मानव बेस बनाने और अंतरिक्ष यात्रियों को वहां भेजने की योजनाओं के लिए सतह की स्थिरता को समझना महत्वपूर्ण होगा। चंद्रमा के सिकुड़ने, सतह पर दरारों और मूनक्वेक का अध्ययन वैज्ञानिकों को उसके भूगर्भीय व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है। यह जानकारी भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की योजना बनाने में भी उपयोगी साबित हो सकती है।