
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी अंग्रेजी पत्रिका ऑर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर के लिखे संपादकीय से बड़ा बवाल खड़ा हो गया है। संपादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा कि किसानों से लेकर छात्रों तक के आंदोलन आखिरकार हिंदू सभ्यता की पहचान के खिलाफ हो जाते हैं। उन्होंने अपने संपादकीय में यहां तक कह दिया कि मनमोहन सिंह की UPA सरकार के कार्यकाल के दौरान सोनिया गांधी की अगुवाई वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में दिमागी नक्सलियों का कब्जा था।
ऑर्गेनइजर के संपादक ने अपने संपादकीय में लिखा कि ये दिमागी नक्सल (शहरों में रहकर माओवादी सोच रखने वाले लोग) चुपचाप काम करते हैं। ये छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और तथाकथित अल्पसंख्यकों के नाम पर कई मोर्चे बनाते हैं और भारतीय सभ्यता और हिंदुत्व को निशाना बनाते हैं।
केतकर ने लिखा कि 2004 से 2014 के दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली UPA सरकार की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (NAC) पर दिमागी नक्सलियों का कब्जा था। उन्होंने कहा कि नौकरशाही, नीति निर्माता, अकादमिक, मीडिया और NGO में घुसपैठ उनकी क्रांतिकारी रणनीति का हिस्सा है।
बता दें कि, NAC को 2004 में UPA सरकार को पॉलिसी से जुड़े मामलों पर सलाह देने के लिए बनाया गया था। इसकी सिफारिशों ने नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी स्कीम, राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट, नेशनल रूरल हेल्थ मिशन, मिड-डे मील स्कीम, जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूअल मिशन और नेशनल रिहैबिलिटेशन पॉलिसी जैसी योजनाओं को आकार देने में मदद की। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली इस काउंसिल में एकेडेमिक्स, सिविल सोसाइटी एक्टिविस्ट और टेक्निकल एक्सपर्ट शामिल थे। गांधी 2004 से मई 2006 तक NAC की चेयरपर्सन रहीं, जब उन्होंने 'ऑफिस-ऑफ-प्रॉफिट' विवाद के बीच काउंसिल और लोकसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया। 2010 में उन्होंने फिर से बनी NAC की कमान संभाली।
केतकर ने तर्क दिया कि दिमागी नक्सल बंदूकें नहीं रखते, बल्कि जाने-माने इतिहासकार या बुद्धिजीवी, पुरस्कार विजेता साहित्यकार, कानूनी विशेषज्ञ, मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, मशहूर अभिनेता या अभिनेत्री और पर्यावरणविद जैसे लेबल के जरिए काम करते हैं। केतकर ने आगे कहा कि ये सिविल सोसाइटी के नाम पर संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ काम करते हैं। वह लोकतांत्रिक तरीकों के जरिए ही देश के लोकतंत्र को खोखला करते हैं और जड़ से खत्म कर देते हैं। उन्होंने आरोप लगाया गया कि बड़ी टेक कंपनियां सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के जरिए इन गतिविधियों का समर्थन करती हैं।
संपादकीय के मुताबिक, दिमागी नक्सल पढ़े लिखे होते हैं और सही मुद्दे उठा सकते हैं, लेकिन वह हर बार अपनी बुद्धि विनाशकारी कामों में लगाते हैं। वह खास एजेंडा चलाकर और सोशल मीडिया पर विचारों को फैलाकर र लोगों की सोच को कंट्रोल करते हैं और उनका इस्तेमाल देश के खिलाफ करते हैं।
केतकर ने हालिया, शिक्षा व रोजगार से जुड़े जेन-जी प्रोटेस्ट को लेकर कहा कि शिक्षा, हेल्थकेयर और विकास के मॉडल में बड़े बदलाव की ज़रूरत है। हालांकि, ये मुद्दे न तो पिछले बारह सालों में पैदा हुए हैं और न ही सिर्फ़ बीजेपी शासित राज्यों में मौजूद हैं। उनके लिए, हिंदुत्व को दबदबे वाली विचारधारा के तौर पर निशाना बनाना और हर दूसरी पहचान को गैर-हिंदू बताना एक बड़ी चाल है।
केतकर ने देश भर में हो रहे अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों को एक बड़ी साजिश का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि कट्टरपंथी इस्लामी, माओवादी, इवेंजेलिकल मिशनरी, बुद्धिजीवी, कानूनी पेशेवर, NGO, बॉलीवुड हस्तियां, सांस्कृतिक समूह और मीडिया के कुछ हिस्से इसमें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि किसानों से लेकर छात्रों तक के विरोध-प्रदर्शन आखिर में हिंदू सभ्यता की पहचान के खिलाफ हो जाते हैं।”
एडिटोरियल में दिवंगत अमेरिकी पॉलिटिकल साइंटिस्ट जीन शार्प का भी जिक्र किया गया, जो रणनीतिक अहिंसक प्रतिरोध पर अपने काम के लिए जाने जाते थे। उन्हें “बोस्टन स्थित दिमागी” (बौद्धिक रणनीतिकार) बताया गया। शार्प ने 1983 में अहिंसक संघर्ष के अध्ययन और उसे आगे बढ़ाने के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन इंस्टीट्यूशन की स्थापना की थी।
एडिटोरियल में कहा गया कि चुनावों को बदनाम करना, सभी नीतियों या कानूनी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाना, एक समूह को दूसरे के खिलाफ खड़ा करना, चुनी हुई सरकार को गैर-कानूनी और दबदबा बनाने वाली बताना और आखिर में चुनावी राजनीति की वैधता को खत्म करना इस रणनीति के अहम कदम हैं। अब 'अवार्ड वापसी' ड्रामे से लेकर 'दिमागी नक्सल पार्टी' तक की कड़ियों को जोड़कर देखें, तो साफ तस्वीर सामने आ जाएगी।
गौरतलब है कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में कहा कि सालों तक सत्ता के गलियारों में नक्सली सोच वाले लोगों का दबदबा रहा। वे सरकारी कमेटियों में सलाहकार के तौर पर शामिल थे। माओवादी सोच का नीतियों पर असर पड़ा। हम जंगलों में हथियारबंद नक्सलियों से निपटने में तो कामयाब रहे, लेकिन ‘दिमागी नक्सली’ (बौद्धिक नक्सली) हिंसा और अशांति फैलाने के मौके तलाश रहे हैं। वे समाज को गलत रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।