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मत पत्र पर नाम, वोट एक भी नहीं- दिलचस्प है राजनाथ सिंह के पहले लोक सभा चुनाव की कहानी

राजनाथ सिंह 13 साल की उम्र से आरएसएस से जुड़े हैं। 1977 में पहली बार लोक सभा चुनाव लड़े थे, लेकिन उनका वह चुनावी सफर अलग ही तरीके से खत्म हुआ था।
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Indian Defense Minister Rajnath Singh
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (File Photo - ANI)

10 जुलाई, 1951 को जन्मे राजनाथ सिंह जब 13 साल के थे तभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से उनका नाता जुड़ गया था। तब वह स्कूल में पढ़ते थे। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की तो जेल जाने वालों में राजनाथ सिंह भी थे। उनके बाहर आने के इंतजार में ही मां का स्वर्गवास हो गया। मां के आखिरी दर्शन भी नहीं हो सके।

इमरजेंसी लगाने के करीब डेढ़ साल बाद, 18 जनवरी, 1977 को इंदिरा गांधी ने लोक सभा के चुनाव कराने की घोषणा कर दी। साथ ही, आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए लोगों को रिहा करने के भी आदेश दिए। मार्च में चुनाव होने थे। इसके लिए विपक्ष तरह तैयार भी नहीं था, क्योंकि उसके सारे नेता जेल में बंद थे। लेकिन, विपक्ष ने गोलबंदी शुरू की और इंदिरा गांधी को हराने के लिए कमर कस ली।

जेल में बंद कई ऐसे नेता थे, जिन्हें पहली बार चुनाव लड़ने का मौका मिला। राजनाथ सिंह भी उनमें से एक थे। उन्हें मिर्जापुर से टिकट मिला। उन्होंने ज़ोर-शोर से प्रचार शुरू किया। लेकिन, मतदान से पहले एक 'खेल' हो गया।

जन संघ, भारतीय लोक दल, सोशलिस्ट पार्टी ने मिल कर इंदिरा गांधी से लोहा लेने का फैसला किया। गठबंधन के समझौते के तहत जन संघ ने मिर्जापुर सीट लोक दल के लिए छोड़ दी। लोक दल ने कालीन कारोबारी फकीर अली अंसारी को उम्मीदवार बनाया।

यह खबर फैलते ही शहर में राजनाथ सिंह के प्रति सुहानुभूति की लहर दौड़ गई। जन संघ के अलावा आरएसएस, एबीवीपी के कार्यकर्ता भी उन्हें समर्थन देने की बात कहने लगे। तमाम कार्यकर्ता उन्हें मैदान में डटे रहने की सलाह देने लगे, लेकिन राजनाथ सिंह ने अपने कुछ समर्थकों के साथ डिस्ट्रिक्ट कलक्टर (डीसी) ऑफिस का रुख कर लिया। नाम वापस लेने के लिए।

डीसी ऑफिस पहुंचने पर अलग ही समस्या खड़ी हो गई। बताया गया कि नाम वापस लेने का वक्त खत्म हो गया। ऐसे में नाम वापस नहीं हो सकता, मत पत्र पर रहेगा। राजनाथ के लिए यह असहज करने वाली स्थिति थी, लेकिन कुछ नेता-कार्यकर्ता निर्दलीय चुनाव लड़ने की सलाह देने लगे। राजनाथ ने एक पल के लिए सोचा और निर्णय लिया कि पार्टी के फैसले के साथ खड़ा रहना है।

राजनाथ डीसी ऑफिस से निकले और भीड़ को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यह उनकी बदकिस्मती है कि मत पत्र से उनका नाम नहीं हटेगा, लेकिन अगर उन्हें एक भी वोट मिला तो इसे वह अपना अपमान समझेंगे। उनकी यह बात उनके समर्थकों ने पूरी तरह मानी। जब वोटों की गिनती हुई तो राजनाथ के नाम एक भी वोट नहीं था।

यह शायद इतिहास का अनोखा और इकलौता चुनाव होगा जिसमें मतपत्र पर नाम होने के बावजूद एक बड़ी पार्टी के लोकप्रिय नेता को एक भी वोट नहीं मिला हो। ऐसा होना उस पार्टी और नेता की मतदाताओं के बीच गहरी अपील ही दिखलाता है।

Updated on:
10 Jul 2026 04:26 pm
Published on:
10 Jul 2026 04:25 pm