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TMC में 20 सांसदों की बगावत, AAP से कैसे अलग निकली ममता बनर्जी की रणनीति?

Trinmool Congress: में 20 सांसदों की बगावत और AAP में सात राज्यसभा सांसदों के अलग होने के घटनाक्रम ने दलबदल कानून और संसदीय रणनीति को चर्चा में ला दिया है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, टीएसमी की शुरुआती कार्रवाई ने बागियों की रणनीति बदल दी, जबकि AAP में बागी गुट शुरुआती राजनीतिक बढ़त हासिल करने में सफल रहा।

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Jun 16, 2026
TMC Crisis
TMC: ममता बनर्जी,अरविंद केजरीवाल(फोटो-IANS)

TMC Crisis: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में 20 सांसदों की बगावत और आम आदमी पार्टी (आप) में सात राज्यसभा सांसदों के अलग होने के घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति में दलबदल और संसदीय रणनीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दोनों मामलों में पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बड़े स्तर पर असंतोष सामने आया, लेकिन राजनीतिक प्रबंधन और संसदीय प्रक्रियाओं के इस्तेमाल में बड़ा अंतर दिखाई दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी नेतृत्व ने शुरुआती स्तर पर ही ऐसा कदम उठाया, जिससे बागी गुट को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी, जबकि आम आदमी पार्टी के मामले में बागी सांसद शुरुआती बढ़त लेने में सफल रहे। समझिए दोनों पार्टियों में कैसे घटनाक्रम समान, पर दांव अलग।

दोनों पार्टियों में तुलना

आम आदमी पार्टी (AAP)तृणमूल कांग्रेस (TMC)
07 राज्यसभा सांसद बागी20 लोकसभा सांसद बागी
राघव चड्ढा ने नेतृत्व कियाकोकिला घोष ने नेतृत्व किया
चड्ढा गुट ने पहले विलय का पत्र दियाटीएमसी ने पहले दलबदल कार्रवाई का पत्र दिया
बाद में AAP ने दलबदल कार्रवाई की मांग कीदलबदल कार्रवाई के बाद बागियों को विलय की रणनीति बदलनी पड़ी
सभापति ने बागी सांसदों की सीटिंग अलग कर दीबागी गुट ने बाद में एनसीपीआई में विलय का पत्र दिया

दलबदल कार्रवाई के पत्र ने बदला खेल


टीएमसी की ओर से 10 जून को बागी सांसदों के खिलाफ दलबदल कार्रवाई की मांग किए जाने के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए। माना जा रहा है कि इसी कारण बागी सांसदों को सीधे अलग संसदीय समूह बनाने के बजाय नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआइ) में विलय का रास्ता चुनना पड़ा। भविष्य में यही गुट दो-तिहाई बहुमत का दावा करते हुए टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा कर सकता है। इसके विपरीत, आम आदमी पार्टी के मामले में राघव चड्ढा गुट ने पहले ही सभापति को पत्र देकर राजनीतिक बढ़त बना ली थी और बाद में पार्टी नेतृत्व ने दलबदल कार्रवाई की मांग की।

और भी हैं उदाहरण


भारतीय राजनीति में दलों के विभाजन के कई उदाहरण रहे हैं। 2022 में शिवसेना में एकनाथ शिंदे की बगावत ने उद्धव ठाकरे सरकार गिरा दी थी, जबकि 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व में दो हिस्सों में बंट गई थी। हालांकि टीएमसी का मौजूदा मामला केवल सांसदों की बगावत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भविष्य, संगठनात्मक नियंत्रण और चुनाव चिह्न की संभावित लड़ाई का भी संकेत दे रहा है।

Updated on:
16 Jun 2026 04:03 am
Published on:
16 Jun 2026 03:59 am