
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इलाज का खर्च पहले ही बड़ी परेशानी बना हुआ है। ऐसे में कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
कोर्ट में सामने मंगलवार को एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को एक इंजेक्शन 11 हजार रुपये में मिलता था, लेकिन अस्पताल में उसी इंजेक्शन के लिए मरीज से 1.30 लाख रुपये मांगे गए।
कीमत में इतने बड़े अंतर को देखने के बाद पर अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। साथ ही यह भी पूछा कि आखिर इस अंतर को सही कैसे ठहराया जा सकता है?
अदालत में सुनवाई के दौरान एक उदाहरण भी पेश किया गया। जिसमें बताया गया कि कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन का मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर मूल्य करीब 11,000 रुपये था। डिस्ट्रीब्यूटर की पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं और उनका इलाज एक बड़े अस्पताल में चल रहा था।
डिस्ट्रीब्यूटर ने अस्पताल के अधिकारियों से अनुरोध किया कि वह खुद इस दवा का कारोबार करता है और उसे इंजेक्शन डीलर कीमत पर मिल जाता है। इसके बावजूद अस्पताल ने उस इंजेक्शन को खुद उपलब्ध कराने की अनुमति नहीं दी और कथित तौर पर इसके लिए 1.30 लाख रुपये वसूले।
मामले पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब एक इंजेक्शन डीलर को 11 हजार रुपये में मिलता है, तो अस्पताल मरीज से 1.30 लाख रुपये कैसे ले सकता है? अदालत ने इस भारी अंतर को लेकर सवाल किया कि आखिर इस तरह की कीमतों को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि दवाओं की कीमतों में इतने बड़े अंतर को रोकने के लिए क्या व्यवस्था है। इस मामले ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की उपलब्धता और उनकी कीमतों को लेकर एक बार फिर चर्चा गर्म कर दी है।
कैंसर के इलाज में मरीजों को अक्सर लंबे समय तक अस्पताल जाना पड़ता है। कीमोथेरेपी, जांच, दवाओं और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं पर होने वाला खर्च परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल सकता है। ऐसे में किसी एक दवा की कीमत में कई गुना अंतर होना मरीजों की परेशानी और बढ़ा सकती है।