
Court proceedings Live Streaming: देश की सबसे बड़ी अदालत के कमरों से सीधी प्रसारित होने वाली बहसें क्या केवल न्यायमूर्तियों और वकीलों तक ही सीमित रहनी चाहिए, या फिर देश का हर नागरिक यह देखने का हक रखता है कि उसके मौलिक अधिकारों पर अदालत में क्या मंथन हो रहा है? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अदालती सुनवाइयों के ऑडियो-वीडियो क्लिप शेयर करने पर लगाए गए अंतरिम प्रतिबंध के बाद यह सवाल एक बार फिर देश के कानूनी और नागरिक समाज के गलियारों में गूंजने लगा है।
इस प्रतिबंधत्मक आदेश पर पुनर्विचार की मांग को लेकर प्रसिद्ध आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और चेरिल डीसोजा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की है।
बीती 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने हरषिता ग्रोवर बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश सुनाया था। अदालत ने सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिना पूर्व अनुमति के अदालती कार्यवाही के वीडियो एक्सट्रैक्ट करने, री-पोस्ट करने, रील्स बनाने या उनके मौद्रिक लाभ (Monetisation) उठाने पर रोक लगा दी थी। पीठ की चिंता यह थी कि अदालतें "24x7 मनोरंजन का साधन" न बन जाएं और भ्रामक मीम्स या संदर्भ से बाहर की क्लिप्स से न्यायपालिका की साख प्रभावित न हो।
आरटीआई कार्यकर्ताओं ने अपनी अर्जी में तर्क दिया है कि इंटरनेट पर फर्जी या भ्रामक सामग्री (Morphed or Misleading Clips) के प्रसार की समस्या जायज है, लेकिन इसका समाधान पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) नहीं हो सकता।
पारदर्शिता और स्वतंत्रता: संविधान के अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष प्रक्रिया) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत 'खुली अदालत' (Open Court System) का सिद्धांत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
सद्भाव और दुर्भावना में अंतर: आदेश में उन लोगों या पत्रकारों के बीच कोई अंतर नहीं रखा गया है जो सद्भाव और सही संदर्भ में क्लिप्स साझा करते हैं, और उनके बीच जो जानबूझकर भ्रामक वीडियो बनाते हैं।
प्रशासनिक विवेकाधिकार का खतरा: हर क्लिप के लिए रजिस्ट्री या सचिव स्तर से पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेने की शर्त एक संवैधानिक अधिकार को नौकरशाही की अनुमति पर निर्भर कर देती है।
नागरिक बनाम संस्थागत मीडिया: 'मान्यता प्राप्त समाचार आउटलेट्स' को दी जाने वाली छूट स्पष्ट नहीं है, क्योंकि भारत में डिजिटल पत्रकारों या नागरिक पत्रकारों (Citizen Journalists) के लिए कोई वैधानिक मान्यता प्रणाली मौजूद नहीं है।
"गलत और भ्रामक क्लिप्स को काटने का सबसे प्रभावी जरिया एक मजबूत, आधिकारिक और स्थायी डिजिटल आर्काइव (Digital Archive) है। जब जनता के पास पूरा मूल वीडियो देखने का विकल्प उपलब्ध होगा, तो कोई भी फर्जी क्लिप खुद-ब-खुद बेनकाब हो जाएगी।" - हस्तक्षेप याचिका में दी गई दलील
याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च अदालत के ही पूर्व के दो प्रमुख फैसलों को आधार बनाया है:
स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट (2018): जिसमें कहा गया था कि लाइव-स्ट्रीमिंग न्याय तक आम जनता की पहुंच का ही एक हिस्सा है।
चुनाव आयोग बनाम एम.आर. विजयभास्कर (2021): जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जजों की मौखिक टिप्पणियों की रिपोर्टिंग पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा था कि डिजिटल मीडिया की आधुनिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
सोशल मीडिया के इस दौर में जहां एक तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रील्स कल्चर के कारण कानूनी बहसों के भ्रामक संदर्भ फैलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पारदर्शी व्यवस्था बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। कार्यकर्ताओं ने अदालत से एक संतुलित दिशानिर्देश तैयार करने की अपील की है, ताकि दुर्भावनापूर्ण कंटेंट पर कानूनन सख्त कार्रवाई हो, लेकिन आम नागरिकों के सूचना पाने और पारदर्शी न्याय प्रणाली देखने के अधिकार पर कोई आंच न आए।