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Supreme Court CEC Case: मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, चयन समिति में CJI क्यों नहीं?

Election Commissioner Appointment : देश में लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर शीर्ष अदालत ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को अलग रखने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सीधा जवाब तलब किया।
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Supreme Court CEC Case

Supreme Court CEC Case: CEC चयन प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, निष्पक्षता दिखना भी उतना ही जरूरी (फोटो सोर्स: ANI)

CJI in CEC Selection Panel: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहली शर्त होते हैं। लेकिन जब चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था के कर्णधारों के चयन की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े होने लगें, तो बहस का दायरा व्यापक हो जाता है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति वाली चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखने के कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। शीर्ष अदालत ने दोटूक शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग को न केवल पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए, बल्कि उसकी यह निष्पक्षता आम जनता को साफ तौर पर नजर भी आनी चाहिए।

'सीबीआई और लोकपाल में CJI, तो चुनाव आयोग में क्यों नहीं?'

मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से तीखा सवाल पूछा "जब सीबीआई (CBI) निदेशक और लोकपाल जैसे पदों के चयन पैनल में देश के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं, तो लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यानी चुनाव आयोग के प्रमुखों को चुनने में CJI को बाहर रखने की क्या वजह रही?"

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि देश को प्रधानमंत्री के फैसलों और उनकी संवैधानिक निष्ठा पर भरोसा रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों के अपने स्वतंत्र अधिकार हैं और संसद की समझ पर सवाल उठाना उसकी स्वतंत्रता में दखल देने जैसा होगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने रुख साफ करते हुए कहा कि बात प्रधानमंत्री पर अविश्वास की बिल्कुल नहीं है, बल्कि सवाल चयन प्रक्रिया के दिखावे और पारदर्शिता का है। पीठ ने टिप्पणी की कि जब मंत्रियों के चयन में आपराधिक पृष्ठभूमि न होने का भरोसा सरकार पर छोड़ा जाता है, तो चुनाव आयुक्त जैसे स्वतंत्र पद के लिए प्रक्रिया का निष्पक्ष दिखना बेहद जरूरी हो जाता है।

क्या है विवाद का मुख्य केंद्र?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायणन और संजय पारिख ने दलील दी कि संसद द्वारा बनाया गया नया कानून सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 के फैसले की मूल भावना के खिलाफ है। मार्च 2024 में इसी नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियां की गई थीं, जिस पर भी काफी राजनीतिक बवाल हुआ था।

फिलहाल, केंद्र सरकार ने इस मामले को फिर से किसी बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने का अनुरोध किया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब पूरे देश की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में एक बार फिर किसी ऐतिहासिक बदलाव का रास्ता साफ करेगा।