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सुप्रीम कोर्ट का सवाल: सिर्फ कैंसर की दवाएं ही क्यों, बाकी दवाओं पर मुनाफे की लगाम क्यों नहीं

30% trade margin on cancer drugs: कैंसर दवाओं पर 30% ट्रेड मार्जिन सीमा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा, बाकी दवाओं और उपकरणों पर लगाम क्यों नहीं? जानिए पूरा मामला।
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Oct 13, 2026
Supreme Court on Sunday
सुप्रीम कोर्ट (फोटो-ANI)

Supreme Court on drug profits: केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैंसर रोधी दवाओं पर व्यापारिक मुनाफे (ट्रेड मार्जिन) की सीमा अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का 30 प्रतिशत तय कर दी गई है। इस पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने पूछा कि मुनाफे पर नियंत्रण सिर्फ कैंसर की दवाओं तक ही क्यों है। पीठ ने कहा कि रोजमर्रा की चिकित्सा सामग्री में भी बेहद ज्यादा मुनाफा लिया जा रहा है। एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन की एमआरपी 78.29 रुपए है, जबकि स्टॉकिस्ट को यह 28.50 रुपए में मिलती है। सलाइन की ड्रिप लाइन की एमआरपी 11 रुपए है, पर यह 270 रुपए में बिकी। कोर्ट ने कहा कि कार्डियक स्टेंट पर 16 प्रतिशत सीमा लगे तो गैर-जरूरी इलाज घटेंगे। पीठ ने दूसरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल उठाए और पूछा कि मरीजों के हित में ऐसी कीमतों का क्या औचित्य है।

सरकार का तर्क, दवाएं पहले ही सस्ती

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार पूरे दवा बाजार को नियंत्रित नहीं करना चाहती। भारत पहले ही सबसे सस्ती कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है, और ज्यादा दखल से उपलब्धता प्रभावित होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सस्ती दवाओं को छोड़कर शेष स्वीकृत कैंसर दवाओं की सूची समय-समय पर जारी होगी। मामले में अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होगी।

अस्पतालों को प्रमुखता से बतानी होंगी इलाज व सुविधाओं की दरें

केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अस्पतालों और अन्य चिकित्सा संस्थानों में इलाज और सुविधाओं की दरें प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना सुनिश्चित किया जाए। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर संबंधित नियमों का सख्ती से पालन कराने को कहा है। इसका मकसद है कि मरीज इलाज का खर्च पहले ही जान सकें, सोच-समझकर फैसला ले सकें और बिल को लेकर होने वाले विवाद घटें।

पत्र में कहा गया है कि दरें ऐसी जगह लगें, जहां मरीज और उनके परिजन इन्हें आसानी से देख सकें। क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 और केंद्रीय नियम, 2012 जिन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में लागू हैं, वहां हर तरह की सेवा और सुविधा की दरें स्थानीय भाषा के साथ अंग्रेजी में भी लगाना जरूरी किया गया है। जिन राज्यों में यह कानून लागू नहीं है, वहां उनके अपने नियमों के अनुसार व्यवस्था चलेगी। स्वास्थ्य सचिव ने राज्यों से कहा है कि वे संबंधित अधिकारियों के जरिये नियमों का पालन कराएं और अस्पतालों को जरूरी निर्देश जारी करें। स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए इन प्रावधानों को लागू कराने और उन पर नजर रखने की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की है।

विदेशी मरीजों के पैकेज की दरें भी बताने पर जोर

केंद्र ने मेडिकल और आयुष वीजा पर भारत आने वाले विदेशी मरीजों के इलाज-पैकेज की दरें भी साफ दिखाने के लिए संस्थानों को प्रोत्साहित करने का आग्रह किया है। इससे विदेशी मरीज खर्च समझकर बेहतर विकल्प चुन सकेंगे और बिल से जुड़ी शिकायतें कम होंगी। साथ ही भारत की चिकित्सा और आयुष सेवाओं पर दुनियाभर के मरीजों का भरोसा बढ़ेगा।

Updated on:
13 Oct 2026 06:38 am
Published on:
13 Oct 2026 06:38 am